भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पृष्ठ 1248

उत नो देव्यदितिरुरुष्यतां नासत्या. उरुष्यन्तु मरुतो वृद्धशवसः.. (१०) अदितिदेवी एवं अश्विनीकुमार हमारी रक्षा करें. अधिक वेग वाले मरुद्गण हमारी रक्षा करें. (१०) ते नो नावमुरुष्यत दिवा नक्तं सुदानवः. अरिष्यन्तो नि पायुभिः सचेमहि.. (११) हे शोभन-दान वाले एवं अहिंसित मरुतो! तुम रात-दिन हमारी नाव की रक्षा करो. तुम्हारे पालन से हम एकत्र होंगे. (११) अघ्नते विष्णवे वयमरिष्यन्तः सुदानवे. श्रुधि स्वयावन्त्सिन्धो पूर्वचित्तये.. (१२) हम पालन के कारण अबाधित होकर हिंसा न करने वाले एवं शोभन दान युक्त विष्णु की स्तुति करेंगे. हे संग्राम में अकेले जाने वाले एवं स्तोताओं को धन देने वाले विष्णु! पूर्वकाल में यज्ञ प्रारंभ करने वाले यजमान की स्तुति सुनो. (१२) तद्दार्यं वृणीमहे वरिष्ठं गोपयत्यम्. मित्रो यत्पान्ति वरुणो यदर्यमा.. (१३) हम श्रेष्ठ, सबके रक्षक एवं वरण करने योग्य धन का आश्रय लेते हैं. इस धन की रक्षा मित्र, वरुण और अर्यमा करते हैं. (१३) उत नः सिन्धुरपां तन्मरुतस्तदश्विना. इन्द्रो विष्णुर्मीढ्वांसः सजोषसः.. (१४) जल बरसाने वाले बादल, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, इंद्र, वरुण एवं सभी अभिलाषापूरक देव मिलकर हमारी रक्षा करें. (१४) ते हि ष्मा वनुषो नरोऽभिमातिं कयस्य चित्. तिग्मं न क्षोदः प्रतिघ्नन्ति भूर्णयः.. (१५) सेवा करने योग्य एवं यज्ञकर्म के नेता वे देवगण शीघ्र गमन करके किसी भी शत्रु का अभिमान इस प्रकार नष्ट कर देते हैं, जिस प्रकार तेज बहने वाला जल वृक्षों को उखाड़ देता है. (१५) अयमेक इत्था पुरूरु चष्टे वि विशपतिः. तस्य व्रतान्यनु वश्वरामसि.. (१६) मनुष्यों का पालन करने वाले ये मित्र अकेले ही बहुत से प्रधान द्रव्यों को अपने तेज से इस प्रकार देखते हैं. हम तुम्हारे कल्याण के लिए मित्र के व्रतों का आचरण करते हैं. (१६) अनु पूर्वायोक्य साम्राज्यस्य सश्चिम. मित्रस्य व्रता वरुणस्य दीर्घश्रुत्.. (१७) हम भली प्रकार सुशोभित होने वाले वरुण के प्राचीन गृहों को प्राप्त होंगे. हम अत्यंत प्रसिद्ध मित्र के व्रत भी करेंगे. (१७)