ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1270, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसरूपैरा सु नो गहि संभृतैः सम्भृताश्वः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१२) हे पुष्ट अश्वों वाले इंद्र! तुम अपने पुष्ट एवं समानरूप वाले घोड़ों के द्वारा आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१२) आ याहि पर्वतेभ्यः समुद्रस्याधि विष्टपः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१३) हे इंद्र! तुम पर्वत, अंतरिक्ष एवं स्वर्ग से आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१३) आ नो गव्यान्यश्व्या सहस्रा शूर दर्दिहि. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१४) हे शूर इंद्र! तुम हमें हजार गाएं एवं घोड़े भली प्रकार दो. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१४) आ नः सहस्रशो भरायुतानि शतानि च. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१५) हे इंद्र! हमें हजार, दस हजार एवं सौ मनचाही वस्तुएं दो. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१५) आ यदिन्द्रश्च दद्द्हे सहस्रं वसुरोचिषः. ओजिष्ठमश्व्यं पशुम्.. (१६) धन द्वारा दीप्त हम हजारों लोग और हमारे नेता इंद्र शक्तिशाली घोड़ों को ग्रहण करते हैं. (१६) य ऋञ्ज्रा वातरंहसोऽरुषासो रघुष्यदः. भ्राजन्ते सूर्या इव.. (१७) वे सरल गति वाले, वायु के समान तीव्रगामी, तेजस्वी एवं थोड़े भीगे हुए घोड़े सूर्य के समान शोभा पाते हैं. (१७) पारावतस्य रातिषु द्रवच्चक्रेष्वाशुषु. तिष्ठं वनस्य मध्य आ.. (१८) रथ के पहियों को चलाने वाले इन घोड़ों को पारावत ने जिस समय दिया था, उस समय मैं वन में था. (१८) सूक्त—३५ देवता—अश्विनीकुमार ebook converter DEMO Watermarks*