ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1285, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसरलतापूर्वक पार पहुंचने वाली ऐसी नाव पर चढ़ेंगे, जिसके सहारे हम सभी पापों के पार जा सकें. (३) आ वां ग्रावाणो अश्विना धीभिर्विप्र अचुच्यवुः. नासत्या सोमपीतये नभन्तामन्यके समे.. (४) हे सत्य रूप वाले अश्विनीकुमारो! विद्वान् ऋत्विज् एवं सोमरस निचोड़ने के काम आने वाले पत्थर अपने-अपने कर्मों के द्वारा सोमरस पान हेतु तुम्हारे सामने आते हैं. अश्विनीकुमार हमारे शत्रुओं को मारें. (४) यथा वामत्रिरश्विना गीर्भिर्विप्रो अजोहवीत्. नासत्या सोमपीतये नभन्तामन्यके समे.. (५) हे सत्यरूप अश्विनीकुमारो! विद्वान् अत्रि ऋषि ने अपनी स्तुतियों द्वारा तुम्हें जिस प्रकार सोमरस पीने के लिए बुलाया था, उसी प्रकार मैं भी बुलाता हूं. अश्विनीकुमार सभी शत्रुओं को मारें. (५) एवा वामहू ऊतये यथाहूवन्त मेधिराः. नासत्या सोमपीतये नभन्तामन्यके समे.. (६) हे सत्यरूप अश्विनीकुमारो! मेधावियों ने तुम्हें जिस प्रकार सोमरस पीने के लिए बुलाया था, उसी प्रकार मैं अपनी रक्षा के लिए बुलाता हूं. अश्विनीकुमार सब शत्रुओं को मारें. (६) सूक्त—४३ देवता—अग्नि इमे विप्रस्य वेधसोऽग्नेरस्तृतयज्वनः. गिरः स्तोमास ईरते.. (१) हमारे स्तोता बुद्धिमान्, विधाता एवं यजमान की हिंसा न करने वाले अग्नि की स्तुति करते हैं. (१) अस्मै ते प्रतिहर्यते जातवेदो विचर्षणे. अग्ने जनामि सुष्टुतिम्.. (२) हे जातवेद एवं विशेष द्रष्टा अग्नि! तुम मुझे दान देने वाले हो. मैं तुम्हारे लिए शोभन स्तुतियों का निर्माण करता हूं. (२) आरोका इव घेदह तिग्मा अग्ने तव त्विषः. दद्भिर्वनानि बप्सति.. (३) हे अग्नि! तुम्हारी तीखी किरणें आरोचमान पशुओं के समान दांतों से वनों को खाती हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*