ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1286, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरयो धूमकेतवो वातजूता उप द्यवि. यतन्ते वृथमग्नयः.. (४) हरणशील, वायु द्वारा प्रेरित एवं धूमरूपी ध्वज वाले अग्नि अंतरिक्ष में अलग-अलग जाते हैं. (४) एते त्ये वृथमग्नय इद्ध्रासः समदृक्षत. उषासामिव केतवः.. (५) अलग-अलग प्रज्वलित ये अग्नियां उषाओं के झंडों के समान दिखाई देती हैं. (५) कृष्णा रजांसि पत्सुतः प्रयाणे जातवेदसः. अग्निर्यद्रोधति क्षमि.. (६) जातवेद अग्नि जिस समय धरती पर सूखी लकड़ियों को जलाते हैं, तब अग्नि के गमन के समय धरती की धूल काली हो जाती है. (६) धासिं कृण्वान ओषधीर्बप्सदग्निर्न वायति. पुनर्यन्तरुणीरपि.. (७) अग्नि ओषधियों को अन्न समझकर भक्षण करते हुए शांत नहीं होते. वे युवा ओषधियों की ओर जाते हैं. (७) जिह्वाभिरह नन्नमदर्चिषा जञ्जणाभवन्. अग्निर्वनेषु रोचते.. (८) अग्नि अपनी ज्वालारूपी जीभों के द्वारा वनस्पतियों को झुकाते हैं एवं अपने तेज के द्वारा उन्हें खाकर वनों में सुशोभित होते हैं. (८) अप्सवग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे. गर्भे सञ्जायसे पुनः.. (९) हे अग्नि! जल में तुम्हारे प्रवेश करने का स्थान है. तुम ओषधियों को रोकते हो एवं उन्हीं ओषधियों में गर्भरूप में स्थित होते हो. (९) उदग्ने तव तद् घृतार्ची रोचत आहुतम्. निंसानं जुह्वो३ मुखे.. (१०) हे अग्नि! तुम घृत द्वारा आहुत सुच का मुंह चाटते हो एवं तुम्हारी ज्वाला सुशोभित होती है. (१०) उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे. स्तोमैर्विधेमाग्नये.. (११) खाने योग्य हवि वाले, अभिलाषा करने योग्य अन्न वाले, सोम एवं घृत से युक्त पीठ वाले एवं अभिलाषाओं के विधाता अग्नि की सेवा हम स्तुतियों द्वारा करते हैं. (११) उत त्वा नमसा वयं होतर्वरेण्यक्रतो. अग्ने समिद्धिरीमहे.. (१२) हे देवों को बुलाने वाले एवं वरणीय प्रजा वाले अग्नि! हम समिधा एवं नमस्कार के द्वारा तुमसे याचना करते हैं. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*