ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1287, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत त्वा भृगुवच्छुचे मनुष्वदग्न आहुत. अङ्गिरस्वद्धवामहे.. (१३) हे शुद्ध एवं बुलाए गए अग्नि! हम भृगु ऋषि, अंगिरा ऋषि एवं राजा मनु के समान तुम्हें बुलाते हैं. (१३) त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता. सखा सख्या समिध्यसे.. (१४) हे विद्वान्, साधु एवं सखा अग्नि! तुम विद्वान्, साधु एवं सखा अग्नियों की सहायता से जलते हो. (१४) स त्वं विप्राय दाशुषे रयिं देहि सहस्रिणम्. अग्ने वीरवतीमिषम्.. (१५) हे प्रसिद्ध अग्नि! तुम बुद्धिमान् हव्यदाता को हजारों धन एवं वीर संतान से युक्त धन दो. (१५) अग्ने भ्रातः सहस्कृत रोहिदश्व शुचिव्रत. इमं स्तोमं जुषस्व मे.. (१६) हे यजमानों के भ्राता, शक्ति के द्वारा उत्पन्न रोहित नामक अश्व के स्वामी एवं शुद्धकर्म वाले अग्नि! तुम मेरे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. (१६) उत त्वाग्ने मम स्तुतो वाश्राय प्रतिहर्यते. गोष्ठं गाव इवाशत.. (१७) हे अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे पास उसी प्रकार जा रही हैं, जिस प्रकार उत्सुक गाएं रंभाती हुई गोशाला में बछड़ों के पास जाती हैं. (१७) तुभ्यं ता अङ्गिरस्तम विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. अग्ने कामाय येमिरे.. (१८) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! सारी प्रजाएं अपनी अभिलाषापूर्ति के लिए अलग-अलग तुम्हारे पास आती हैं. (१८) अग्निं धीभिर्मनीषिणो मेधिरासो विपश्चितः. अद्मसद्याय हिन्विरे.. (१९) स्वाभिमानी, मेधावी एवं विद्वान् यजमान अन्न पाने के लिए अग्नि को यज्ञकर्मों द्वारा प्रसन्न करते हैं. (१९) तं त्वामज्मेषु वाजिनं तन्वाना अग्ने अध्वरम्. वह्निं होतारमीळते.. (२०) हे शक्तिशाली, हव्यवहन करने वाले, देवों को बुलाने वाले एवं प्रसिद्ध अग्नि! यज्ञशालाओं में यज्ञों का विस्तार करने वाले यजमान तुम्हारी स्तुति करते हैं. (२०) पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि विशो विश्वा अनु प्रभुः. समत्सु त्वा हवामहे.. (२१) हे अग्नि! क्योंकि तुम प्रभु एवं बहुत से प्रदेशों में सभी प्रजाओं को समान रूप से देखने ebook converter DEMO Watermarks*