ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1288, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाले हो, इसलिए हम तुम्हें युद्धों में बुलाते हैं. (२१) तमीळिष्व य आहुतोऽग्निर्विभ्राजते घृतैः. इमं नः शृणवद्धवम्.. (२२) घृत के साथ आहुतियां पाकर विराजमान एवं हमारे इस आह्वान को सुनने वाले अग्नि की स्तुति करो. (२२) तं त्वा वयं हवामहे शृण्वन्तं जातवेदसम्. अग्ने घ्नन्तमप द्विषः.. (२३) हे अग्नि! तुम जातवेद, शत्रुनाशक एवं हमारी पुकार सुनने वाले हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. (२३) विशां राजानमद्भुतमध्यक्षं धर्मणामिमम्. अग्निमीळे स उ श्रवत्.. (२४) मैं प्रजाओं के राजा, अद्भुत एवं यज्ञकर्मों के अध्यक्ष अग्नि की स्तुति करता हूं. वे मेरी स्तुति सुनें. (२४) अग्निं विश्वायुवेपसं मर्त्यं न वाजिनं हितम्. सप्तिं न वाजयामसि.. (२५) हम सर्वगत-शक्ति वाले, बलशाली एवं मानवों के समान सबके हितकारी अग्नि को अपनी स्तुतियों द्वारा अश्व के समान शक्तिशाली बनाते हैं. (२५) घ्नमृध्राण्यप द्विषो दहन् रक्षांसि विश्वहा. अग्ने तिग्मेन दीदिहि.. (२६) हे अग्नि! तुम हिंसकों और द्वेषियों को नष्ट करते हुए एवं राक्षसों को जलाते हुए तीक्ष्ण तेज के द्वारा दीप्त बनो. (२६) यं त्वा जनास इन्धते मनुष्वदङ्गिरस्तम. अग्ने स बोधि मे वचः.. (२७) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम्हें जिस प्रकार मनु ने प्रज्वलित किया था, उसी प्रकार ये लोग जलाते हैं. तुम मेरी स्तुति जानो. (२७) यदग्ने दिविजा अस्यप्सुजा वा सहस्कृत. तं त्वा गीर्भिर्हवामहे.. (२८) हे अग्नि! तुम स्वर्गलोक में उत्पन्न, अंतरिक्ष में उत्पन्न एवं शक्ति से उत्पन्न हो. हम तुम्हें स्तुति द्वारा बुलाते हैं. (२८) तुभ्यं घेत्ते जना इमे विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. धासिं हिन्वन्त्यत्तवे.. (२९) हे अग्नि! ये सब सेवक एवं शोभन प्रजाएं तुम्हारे भक्षण के लिए अलग अन्न देती हैं. (२९) ते घेदग्ने स्वाध्योऽहा विश्वा नृचक्षसः. तरन्तः स्याम दुर्गाहा.. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*