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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

हरयो धूमकेतवो वातजूता उप द्यवि. यतन्ते वृथमग्नयः.. (४) हरणशील, वायु द्वारा प्रेरित एवं धूमरूपी ध्वज वाले अग्नि अंतरिक्ष में अलग-अलग जाते हैं. (४) एते त्ये वृथमग्नय इद्ध्रासः समदृक्षत. उषासामिव केतवः.. (५) अलग-अलग प्रज्वलित ये अग्नियां उषाओं के झंडों के समान दिखाई देती हैं. (५) कृष्णा रजांसि पत्सुतः प्रयाणे जातवेदसः. अग्निर्यद्रोधति क्षमि.. (६) जातवेद अग्नि जिस समय धरती पर सूखी लकड़ियों को जलाते हैं, तब अग्नि के गमन के समय धरती की धूल काली हो जाती है. (६) धासिं कृण्वान ओषधीर्बप्सदग्निर्न वायति. पुनर्यन्तरुणीरपि.. (७) अग्नि ओषधियों को अन्न समझकर भक्षण करते हुए शांत नहीं होते. वे युवा ओषधियों की ओर जाते हैं. (७) जिह्वाभिरह नन्नमदर्चिषा जञ्जणाभवन्. अग्निर्वनेषु रोचते.. (८) अग्नि अपनी ज्वालारूपी जीभों के द्वारा वनस्पतियों को झुकाते हैं एवं अपने तेज के द्वारा उन्हें खाकर वनों में सुशोभित होते हैं. (८) अप्सवग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे. गर्भे सञ्जायसे पुनः.. (९) हे अग्नि! जल में तुम्हारे प्रवेश करने का स्थान है. तुम ओषधियों को रोकते हो एवं उन्हीं ओषधियों में गर्भरूप में स्थित होते हो. (९) उदग्ने तव तद् घृतार्ची रोचत आहुतम्. निंसानं जुह्वो३ मुखे.. (१०) हे अग्नि! तुम घृत द्वारा आहुत सुच का मुंह चाटते हो एवं तुम्हारी ज्वाला सुशोभित होती है. (१०) उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे. स्तोमैर्विधेमाग्नये.. (११) खाने योग्य हवि वाले, अभिलाषा करने योग्य अन्न वाले, सोम एवं घृत से युक्त पीठ वाले एवं अभिलाषाओं के विधाता अग्नि की सेवा हम स्तुतियों द्वारा करते हैं. (११) उत त्वा नमसा वयं होतर्वरेण्यक्रतो. अग्ने समिद्धिरीमहे.. (१२) हे देवों को बुलाने वाले एवं वरणीय प्रजा वाले अग्नि! हम समिधा एवं नमस्कार के द्वारा तुमसे याचना करते हैं. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

उत त्वा भृगुवच्छुचे मनुष्वदग्न आहुत. अङ्गिरस्वद्धवामहे.. (१३) हे शुद्ध एवं बुलाए गए अग्नि! हम भृगु ऋषि, अंगिरा ऋषि एवं राजा मनु के समान तुम्हें बुलाते हैं. (१३) त्वं ह्यग्ने अग्निना विप्रो विप्रेण सन्सता. सखा सख्या समिध्यसे.. (१४) हे विद्वान्, साधु एवं सखा अग्नि! तुम विद्वान्, साधु एवं सखा अग्नियों की सहायता से जलते हो. (१४) स त्वं विप्राय दाशुषे रयिं देहि सहस्रिणम्. अग्ने वीरवतीमिषम्.. (१५) हे प्रसिद्ध अग्नि! तुम बुद्धिमान् हव्यदाता को हजारों धन एवं वीर संतान से युक्त धन दो. (१५) अग्ने भ्रातः सहस्कृत रोहिदश्व शुचिव्रत. इमं स्तोमं जुषस्व मे.. (१६) हे यजमानों के भ्राता, शक्ति के द्वारा उत्पन्न रोहित नामक अश्व के स्वामी एवं शुद्धकर्म वाले अग्नि! तुम मेरे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. (१६) उत त्वाग्ने मम स्तुतो वाश्राय प्रतिहर्यते. गोष्ठं गाव इवाशत.. (१७) हे अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे पास उसी प्रकार जा रही हैं, जिस प्रकार उत्सुक गाएं रंभाती हुई गोशाला में बछड़ों के पास जाती हैं. (१७) तुभ्यं ता अङ्गिरस्तम विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. अग्ने कामाय येमिरे.. (१८) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! सारी प्रजाएं अपनी अभिलाषापूर्ति के लिए अलग-अलग तुम्हारे पास आती हैं. (१८) अग्निं धीभिर्मनीषिणो मेधिरासो विपश्चितः. अद्मसद्याय हिन्विरे.. (१९) स्वाभिमानी, मेधावी एवं विद्वान् यजमान अन्न पाने के लिए अग्नि को यज्ञकर्मों द्वारा प्रसन्न करते हैं. (१९) तं त्वामज्मेषु वाजिनं तन्वाना अग्ने अध्वरम्. वह्निं होतारमीळते.. (२०) हे शक्तिशाली, हव्यवहन करने वाले, देवों को बुलाने वाले एवं प्रसिद्ध अग्नि! यज्ञशालाओं में यज्ञों का विस्तार करने वाले यजमान तुम्हारी स्तुति करते हैं. (२०) पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि विशो विश्वा अनु प्रभुः. समत्सु त्वा हवामहे.. (२१) हे अग्नि! क्योंकि तुम प्रभु एवं बहुत से प्रदेशों में सभी प्रजाओं को समान रूप से देखने ebook converter DEMO Watermarks*

वाले हो, इसलिए हम तुम्हें युद्धों में बुलाते हैं. (२१) तमीळिष्व य आहुतोऽग्निर्विभ्राजते घृतैः. इमं नः शृणवद्धवम्.. (२२) घृत के साथ आहुतियां पाकर विराजमान एवं हमारे इस आह्वान को सुनने वाले अग्नि की स्तुति करो. (२२) तं त्वा वयं हवामहे शृण्वन्तं जातवेदसम्. अग्ने घ्नन्तमप द्विषः.. (२३) हे अग्नि! तुम जातवेद, शत्रुनाशक एवं हमारी पुकार सुनने वाले हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. (२३) विशां राजानमद्भुतमध्यक्षं धर्मणामिमम्. अग्निमीळे स उ श्रवत्.. (२४) मैं प्रजाओं के राजा, अद्भुत एवं यज्ञकर्मों के अध्यक्ष अग्नि की स्तुति करता हूं. वे मेरी स्तुति सुनें. (२४) अग्निं विश्वायुवेपसं मर्त्यं न वाजिनं हितम्. सप्तिं न वाजयामसि.. (२५) हम सर्वगत-शक्ति वाले, बलशाली एवं मानवों के समान सबके हितकारी अग्नि को अपनी स्तुतियों द्वारा अश्व के समान शक्तिशाली बनाते हैं. (२५) घ्नमृध्राण्यप द्विषो दहन् रक्षांसि विश्वहा. अग्ने तिग्मेन दीदिहि.. (२६) हे अग्नि! तुम हिंसकों और द्वेषियों को नष्ट करते हुए एवं राक्षसों को जलाते हुए तीक्ष्ण तेज के द्वारा दीप्त बनो. (२६) यं त्वा जनास इन्धते मनुष्वदङ्गिरस्तम. अग्ने स बोधि मे वचः.. (२७) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम्हें जिस प्रकार मनु ने प्रज्वलित किया था, उसी प्रकार ये लोग जलाते हैं. तुम मेरी स्तुति जानो. (२७) यदग्ने दिविजा अस्यप्सुजा वा सहस्कृत. तं त्वा गीर्भिर्हवामहे.. (२८) हे अग्नि! तुम स्वर्गलोक में उत्पन्न, अंतरिक्ष में उत्पन्न एवं शक्ति से उत्पन्न हो. हम तुम्हें स्तुति द्वारा बुलाते हैं. (२८) तुभ्यं घेत्ते जना इमे विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. धासिं हिन्वन्त्यत्तवे.. (२९) हे अग्नि! ये सब सेवक एवं शोभन प्रजाएं तुम्हारे भक्षण के लिए अलग अन्न देती हैं. (२९) ते घेदग्ने स्वाध्योऽहा विश्वा नृचक्षसः. तरन्तः स्याम दुर्गाहा.. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि! हम तुम्हारे लिए ही शोभन कर्म वाले एवं सभी दिवसों में तत्त्वद्रष्टा बनकर दुर्गम स्थानों को पार करेंगे. (३०) अग्निं मन्द्रं पुरुप्रियं शीरं पावकशोचिषम्. हृद्भिर्मन्द्रेभिरीमहे.. (३१) हम प्रसन्न, बहुतों के प्रिय, यज्ञों में सोने वाले एवं पवित्र दीप्ति वाले अग्नि से मनोहर तथा मादक स्तोत्रों द्वारा याचना करते हैं. (३१) स त्वमग्ने विभावसुः सृजन्सूर्यो न रश्मिभिः. शर्धन्तमांसि जिघ्नसे.. (३२) हे दीप्तिरूपी धन वाले अग्नि! तुम सूर्य के समान किरणों द्वारा अपनी शक्ति बढ़ाते हुए अंधकारों का नाश करते हो. (३२) तत्ते सहस्व ईमहे दात्रं यन्नोपदस्यति. त्वदग्ने वार्यं वसु.. (३३) हे शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारा जो वरण एवं दान योग्य धन क्षीण नहीं होता, हम उसी की याचना करते हैं. (३३) सूक्त—४४ देवता—अग्नि समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्. आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (१) हे ऋत्विजो! अतिथि के समान प्रिय अग्नि की समिधा द्वारा सेवा करो, उन्हें घृत द्वारा जगाओ. प्रज्वलित अग्नि में हव्यों का हवन करो. (१) अग्ने स्तोमं जुषस्व मे वर्धस्वानेन मन्मना. प्रति सूक्तानि हर्य नः.. (२) हे अग्नि! तुम मेरे स्तुति मंत्रों को स्वीकार करो, इस मनोहर स्तोत्र द्वारा बढ़ो एवं हमारे सूक्तों की कामना करो. (२) अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे. देवाँ आ सादयादिह.. (३) मैं देवों के दूत एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि को अपने सामने स्थापित करता हूं तथा उनकी स्तुति करता हूं. वे इस यज्ञ में देवों को बैठावें. (३) उत्ते बृहन्तो अर्चयः समिधानस्य दीदिवः. अग्ने शुक्रांस ईरते.. (४) हे दीप्तिशाली अग्नि! जब तुम प्रज्वलित होते हो, तब तुम्हारी बढ़ी हुई एवं ज्वलंत किरणें ऊपर उठती हैं. (४) उप त्वा जुह्वो३ मम घृताचीर्यन्तु हर्यत. अग्ने हव्या जुषस्व नः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अभिलाषा करने वाले अग्नि! मेरा घृत धारण करने वाला स्रुच तुम्हारे पास जावे. तुम हमारे हव्यों को स्वीकार करो. (५) मन्द्रं होतारमृत्विजं चित्रभानुं विभावसुम्. अग्निमीळे स उ श्रवत्.. (६) मैं प्रसन्न, देवों को बुलाने वाले, ऋत्विज्, विचित्र प्रकाश वाले एवं दीप्तिरूपी धन से युक्त अग्नि की स्तुति करता हूं. अग्नि मेरी स्तुति सुनें. (६) प्रत्नं होतारमीड्यं जुष्टमग्निं कविक्रतुम्. अध्वराणामभिश्रियम्.. (७) मैं प्राचीन, देवों को बुलाने वाले, स्तुतियोग्य, सेवित, कार्य पूर्ण करने वाले एवं यज्ञों का आश्रय लेने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (७) जुषाणो अङ्गिरस्तमेमा हव्यान्यानुषक्. अग्ने यज्ञं नय ऋतुथा.. (८) हे अंगिराओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम क्रम से हमारे हव्यों का सेवन करो एवं हमारे यज्ञों को ऋतुओं के अनुसार पूर्ण करो. (८) समिधान उ सन्त्य शुक्रशोच इहा वह. चिकित्वान् दैव्यं जनम्.. (९) हे सेवा स्वीकार करने वाले एवं उज्ज्वल दीप्तियुक्त अग्नि! तुम प्रज्वलित होते हुए एवं देवों के भक्तजनों को जानते हुए इस यज्ञ में आओ. (९) विप्रं होतारमद्रुहं धूमकेतुं विभावसुम्. यज्ञानां केतुमीमहे.. (१०) हम मेधावी, देवों को बुलाने वाले, शत्रुतारहित, धूमरूपी ध्वजा वाले, दीप्तिरूपी धन से युक्त एवं यज्ञों की पताका के समान अग्नि से अपनी अभिलषित वस्तुएं मांगते हैं. (१०) अग्ने नि पाहि नस्त्वं प्रति ष्म देव रीषतः. भिन्धि द्वेषः सहस्कृत.. (११) हे शक्ति द्वारा उत्पन्न अग्नि! हिंसकों से हमारी रक्षा करो एवं शत्रुओं का भेदन करो. (११) अग्निः प्रत्नेन मन्मना शुम्भानस्तन्वं१ स्वाम्. कविर्विप्रेण वावृधे..(१२) बुद्धिमान् अग्नि प्राचीन एवं सुंदर स्तोत्रों द्वारा अपने शरीर को सुशोभित बनाते हुए मेधावियों के साथ बढ़ते हैं. (१२) ऊर्जो नपातमा हुवेऽग्निं पावकशोचिषम्. अस्मिन्यज्ञे स्वध्वरे.. (१३) मैं अन्न के पुत्र एवं पवित्र दीप्ति वाले अग्नि को इस हिंसाशून्य यज्ञ में बुलाता हूं. (१३) स नो मित्रमहस्त्वमग्ने शुक्रेण शोचिषा. देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (१४)

हे मित्रों के पूजनीय अग्नि! तुम उज्ज्वल तेज से युक्त होकर देवों के साथ यज्ञ के कुशों पर बैठते हो. (१४) यो अग्निं तन्वो३ दमे देवं मर्तः सपर्यति. तस्मा इद्दीदयद्वसु.. (१५) जो मनुष्य धनप्राप्ति के लिए अपने घर में अग्नि की सेवा करता है, अग्नि उसीको धन देते हैं. (१५) अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्. अपां रेतांसि जिन्वति.. (१६) देवों के मस्तक, द्युलोक के कूबड़ और धरती के पति अग्नि जल के प्राणियों को प्रसन्न करते हैं. (१६) उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते. तव ज्योतींष्यर्चयः.. (१७) हे अग्नि! तुम्हारी निर्मल, शुक्लवर्ण और दीप्ति वाली किरणें तुम्हारे तेज को प्रेरित करती हैं. (१७) ईशिषे वार्यस्य हि दात्रस्याग्ने स्वर्पतिः. स्तोता सयां तव शर्मणि.. (१८) हे स्वर्ग के पति अग्नि! तुम वरणीय एवं देने योग्य धन के स्वामी हो. मैं सुख के निमित्त तुम्हारा स्तोता बनूं. (१८) त्वामग्ने मनीषिणस्त्वां हिन्वन्ति चित्तिभिः. त्वां वर्धन्तु नो गिरः.. (१९) हे अग्नि! मनीषी लोग तुम्हारी स्तुति करते हुए यज्ञकर्मों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं. हमारी स्तुतियां तुम्हें बढ़ावें. (१९) अदब्धस्य स्वधावतो दूतस्य रेभतः सदा. अग्नेः सख्यं वृणीमहे.. (२०) हम हिंसारहित, शक्तिशाली, देवों के दूत एवं देवों की स्तुति करने वाले अग्नि की मित्रता चाहते हैं. (२०) अग्निः शुचिव्रततमः शुचिर्विप्रः शुचिः कविः. शुची रोचत आहुतः.. (२१) अतिशय शुद्ध कर्मों वाले, शुद्ध मेधावी, पवित्र व यज्ञकार्य समाप्त करने वाले अग्नि बुलाने पर सुशोभित होते हैं. (२१) उत त्वा धीतयो मम गिरो वर्धन्तु विश्वहा. अग्ने सख्यस्य बोधि नः.. (२२) हे अग्नि! मेरी स्तुतियां एवं यज्ञकर्म तुम्हें सदा बढ़ावें. तुम हमारी मित्रता को सदा जानो. (२२) eBook converter DEMO Watermarks*

यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वा घा स्या अहम्. स्युष्टे सत्या इहाशिषः.. (२३) हे अग्नि! यदि मैं तुम्हारे समान बहुत धन वाला हो जाऊं और तुम मेरे समान दरिद्र बन जाओ, तब तुम्हारा आशीर्वाद सत्य हो. (२३) वसुर्वसुपतिर्हि कमस्यग्ने विभावसुः. स्याम ते सुमतावपि.. (२४) हे अग्नि! तुम दीप्तिरूपी धन वाले, धनस्वामी व निवासस्थान देने वाले हो. हम तुम्हारे अनुग्रह में रहें. (२४) अग्ने धृतव्रताय ते समुद्रायेव सिन्धवः. गिरो वाश्रास ईरते.. (२५) हे यज्ञकर्म धारण करने वाले अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे समीप उसी प्रकार पहुंचती हैं, जिस प्रकार नदियां समुद्र के पास जाती हैं. (२५) युवानं विशपतिं कविं विश्वादं पुरुवेपसम्. अग्निं शुम्भामि मन्मभिः.. (२६) मैं स्तुतियों द्वारा नित्यतरुण, प्रजाओं के स्वामी, कवि, सभी हवियों को खाने वाले एवं बहुत कर्म करने वाले अग्नि को सुशोभित करता हूं. (२६) यज्ञानां रथ्ये वयं तिग्मजम्भाय वीळवे. स्तोमैरिक्षेमाग्नये.. (२७) हम यज्ञों के नेता, तीखी ज्वालाओं वाले एवं शक्तिशाली अग्नि के लिए स्तुतियां करना चाहते हैं. (२७) अयमग्ने त्वे अपि जरिता भूतु सन्त्य. तस्मै पावक मृळय.. (२८) हे सेवा योग्य एवं पवित्रकर्त्ता अग्नि! हमारा स्तोता तुम्हारी स्तुति करे और तुम उसे सुख दो. (२८) धीरो ह्यस्यद्मसद् विप्रो न जागृविः सदा. अग्ने दीदयसि द्यवि.. (२९) हे अग्नि! तुम धीर, हवि में स्थित रहने वाले एवं मेधावी के समान प्रजाओं के हित में सदा जागृत रहते हो एवं सदा अंतरिक्ष में दीप्त रहते हो. (२९) पुराग्ने दुरितेभ्यः पुरा मृध्रेभ्यः कवे. प्र ण आयुर्वसो तिर.. (३०) हे कवि एवं वासदाता अग्नि! हमें पापियों एवं हिंसकों के सामने से बचाकर हमारी उमर बढ़ाओ. (३०) सूक्त—४५ देवता—इंद्र eBook converter DEMO Watermarks*

आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (१) युवा इंद्र जिनके मित्र हैं, वे ऋषि मिलकर अग्नि को भली प्रकार जाते हैं एवं कुश बिछाते हैं. (१) बृहन्निदिध्म एषां भूरि शस्तं पृथुः स्वरुः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (२) युवा इंद्र जिनके मित्र हैं, उन ऋषियों की समिधाएं बड़ी हैं, स्तोत्र बहुत हैं और यज्ञ महान् हैं. (२) अयुद्ध इद्युधा वृतं शूर आजति सत्वभिः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (३) युवा इंद्र जिनके मित्र हैं, ऐसे व्यक्ति योद्धा न होने पर भी शत्रुओं द्वारा घिर कर अपनी शक्ति से वीरतापूर्वक उन्हें झुकाते हैं. (३) आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्छद्वि मातरम्. क उग्राः के ह शृण्विरे.. (४) इंद्र ने उत्पन्न होते ही बाण उठा लिया और अपनी माता से पूछा—“उग्र एवं शक्ति द्वारा प्रसिद्ध कौन है?” (४) प्रति त्वा शवसी वदद् गिरावप्सो न योधिसत्. यस्ते शत्रुत्वमाचके.. (५) हे इंद्र! शक्तिशालिनी माता ने तुम्हें उत्तर दिया—“जो तुम्हारे साथ शत्रुता का आचरण करता है वह पर्वत पर दर्शनीय हाथी के समान युद्ध करता है.” (५) उत त्वं मघवञ्छृणु यस्ते वष्टि ववक्षि तत्. यद्वीळयासि वीळु तत्.. (६) हे धन वाले इंद्र! तुम हमारी स्तुति सुनो. तुम्हारा स्तोता जो चाहता है, उसे तुम वही देते हो. तुम जिसे दृढ़ करते हो, वह अवश्य दृढ़ हो जाता है. (६) यदाजिं यात्याजिकृदिन्द्रः स्वश्वयुरूप. रथीतमॊ रथीनाम्.. (७) युद्धकर्त्ता एवं शोभन अश्व वाले अभिलाषी इंद्र जब युद्ध करने जाते हैं तब वे रथियों में सबसे प्रधान होते हैं. (७) वि षु विश्वा अभियुजो वज्रिन्विष्वग्यथा वृह. भवा नः सुश्रवस्तमः.. (८) हे वज्रधारी इंद्र! तुम इस प्रकार बढ़ो कि तुमसे सारी प्रजा वृद्धि को प्राप्त हो. तुम हमारे लिए सर्वाधिक अन्न देने वाले बनो. (८) अस्माकं सु रथं इन्द्रः कृणोतु सातये. न यं धूर्वन्ति धूर्तयः.. (९) वे इंद्र हमें अभीष्ट फल देने के लिए अपना सुंदर रथ हमारे सामने स्थापित करें, जिनकी

हिंसा हिंसक भी न कर सकें. (९) वृज्याम ते परि द्विषोऽरं ते शक्र दावने. गमेमेदिन्द्र गोमतः.. (१०) हे इंद्र! हम याचना करने के लिए तुम्हारे शत्रुओं के पास न जावें. हे गायों वाले एवं पर्याप्त दाता इंद्र! हम तुम्हारे पास जावें. (१०) शनैश्चिद्यन्तो अद्रिवोऽश्वावन्तः शतग्विनः. विवक्षणा अनेहसः.. (११) हे वज्रधारी इंद्र! तुम धीरे-धीरे जाते हुए इन घोड़ों वाले, अधिक धनसंपन्न, चतुर एवं उपद्रवरहित हो. (११) ऊर्ध्वा हि ते दिवेदिवे सहस्रा सूनृता शता. जरितृभ्यो विमंहते.. (१२) हे इंद्र! यजमान तुम्हारे स्तोता के लिए प्रतिदिन सैकड़ों एवं हजारों उत्तम सुखसाधन देता है. (१२) विद्या हि त्वा धनञ्जयमिन्द्र दृळ्हा चिदारुजम्. आदारिणं यथा गयम्.. (१३) हे इंद्र! हम तुम्हें धन जीतने वाला, दृढ़ शत्रुओं को भी भग्न करने वाला, शत्रुओं का धन छीनने वाला एवं घर के समान रक्षा करने वाला जानते हैं. (१३) ककुहं चित्त्वा कवे मन्दन्तु धृष्णविन्दवः. आ त्वा पणिं यदीमहे.. (१४) हे कवि, शत्रुपराभवकारी एवं वणिक्वृत्ति वाले इंद्र! जब हम तुमसे अभीष्ट वस्तु की याचना करें, उस समय हमारा सोम बैल की ठाट के समान ऊंचा होकर तुम्हें प्रसन्न करे. (१४) यस्ते रेवाँ अदाशुरिः प्रममर्ष मघत्तये. तस्य नो वेद आ भर.. (१५) हे इंद्र! जो व्यक्ति धनवान् होकर तुम धनस्वामी के लिए दान नहीं करता अथवा तुम्हारी निंदा करता है, उसका धन हमारे पास ले आओ. (१५) इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः. पुष्टावन्तो यथा पशुम्.. (१६) हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले मेरे वे मित्र तुम्हें उसी प्रकार देखते हैं, जिस प्रकार घास लाने वाले लोग पशु को देखते हैं. (१६) उत त्वाबधिरं वयं श्रुत्कर्णं सन्तम्मतये. दूरादिह हवामहे.. (१७) हे बधिरतारहित एवं सुनने में सक्षम कान वाले इंद्र! यज्ञ में रक्षा के निमित्त तुम्हें हम दूर से बुलाते हैं. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*

यच्छुश्रूया इमं हवं दुर्मर्ष चक्रिया उत. भवेरापिनों अन्तम:.. (१८) हे इंद्र! हमारी यह पुकार सुनो, अपना बल शत्रुओं के लिए असहनीय बनाओ एवं हमारे सर्वाधिक बंधु बनो. (१८) यच्चिद्धि ते अपि व्यथिर्जगन्वांसो अमन्महि. गोदा इदिन्द्र बोधि न:.. (१९) हे इंद्र! जब हम दरिद्रता से परेशान होकर तुम्हारे पास जावें और स्तुति करें, उस समय तुम हमें गाय देने के लिए जागना. (१९) आ त्वा रम्भं न जिब्रयो ररम्भा शवसस्पते. उश्मसि त्वा सधस्थ आ.. (२०) हे बलपति इंद्र! कमजोर बूढ़ा जिस प्रकार लकड़ी का सहारा लेता है, उसी प्रकार हम तुम्हें प्राप्त करें एवं यज्ञ में तुम्हारी कामना करें. (२०) स्तोत्रमिन्द्राय गायत पुरुनृम्णाय सत्वने. नकिर्यं वृण्वते युधि.. (२१) जिस इंद्र को युद्ध में कोई नहीं हरा सकता, उस दानशील व बहुत धन वाले इंद्र के लिए स्तोत्र पढ़ो. (२१) अभि त्वा वृषभा सुते सुतं सृजामि पीतये. तृम्पा व्यश्नुही मदम्.. (२२) हे शक्तिशाली इंद्र! सोमरस निचोड़ जाने पर मैं सोमरस पीने के लिए तुम्हें देता हूं. तुम तृप्त बनो एवं नशीला सोमरस पिओ. (२२) मा त्वा मूरा अविष्यवो मोपहस्वान आ दभन्. माकीं ब्रह्मद्विषो वन:.. (२३) हे इंद्र! बुद्धिहीन लोग अपनी रक्षा की इच्छा से तुम्हारी हिंसा न करें और न तुम्हारी हंसी उड़ावें. उन ब्राह्मणद्वेषियों के पास मत जाना. (२३) इह त्वा गोपरीणसा महे मन्दन्तु राधसे. सरो गौरो यथा पिब.. (२४) हे इंद्र! लोग महान् धन पाने के लिए तुम्हें गाय के दूध से मिले सोमरस द्वारा प्रसन्न करें. तुम गौरमृग के समान सोमरस पिओ. (२४) या वृत्रहा परावति सना नवा च चुच्युवे. ता संसत्सु प्र वोचत.. (२५) वृत्रहंता इंद्र ने दूर देश में जो सनातन एवं नवीन धन दिया है, उसे विद्वान् लोग सभाओं में बतावें. (२५) अपिबत् कद्रुवः सुतमिन्द्रः सहस्रबाह्वे. अत्रादेदिष्ट पौंस्यम्.. (२६) हे इंद्र! तुमने कद्रु ऋषि द्वारा निचोड़ा गया सोमरस पिया एवं उनके शत्रुओं को मारा. ebook converter DEMO Watermarks*

इस अवसर पर इंद्र का पुरुषार्थ उद्दीप्त हुआ. (२६) सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्. व्यानट् तुर्वणे शमि.. (२७) हे इंद्र! तुमने तुर्वश और यदु नामक राजाओं के प्रसिद्ध यज्ञकर्म को सच्चा जानकर उनकी प्रसन्नता के लिए उनके शत्रु अह्नवाय्य को संग्राम में घेरा था. (२७) तरणिं वो जनानां त्रदं वाजस्य गोमतः. समानमु प्र शंसिषम्.. (२८) हे स्तोताओ! तुम्हारे पुत्र-पौत्रादि के तारक, शत्रुनाशक, गायों से युक्त अन्न देने वाले एवं सबके प्रति समान इंद्र की मैं स्तुति करता हूं. (२८) ऋभुक्षणं न वर्तव उक्थेषु तुग्र्यावृधम्. इन्द्रं सोमे सचा सुते.. (२९) स्तोत्र उच्चारण के साथ सोमरस निचुड़ जाने पर एवं उक्थ मंत्रों का उच्चारण आरंभ होने पर मैं धन पाने के लिए महान् तथा जलवर्षक इंद्र की प्रशंसा करता हूं. (२९) यः कृन्तदिद्वि योन्यं त्रिशोकाय गिरिं पृथुम्. गोभ्यो गातुं निरेतवे.. (३०) जिन इंद्र ने त्रिलोक ऋषि की प्रार्थना पर जल निकलने के द्वार समान एवं विस्तृत मेघ को विच्छिन्न किया था, उन्हीं जलों के निकलने के लिए मार्ग बनाया था. (३०) यद्दधिषे मनस्यसि मन्दानः प्रेदियक्षसि. मा तत्करिन्द्र मृळय.. (३१) हे इंद्र! तुम प्रसन्न होकर जो शुभ वस्तु धारण करते हो, जिसकी पूजा करते हो, जो देते हो, वह हमारे लिए क्यों नहीं करते? तुम हमें सुखी करो. (३१) दभ्रं चिद्धि त्वावतः कृतं शृण्वे अधि क्षमि. जिगात्विन्द्र ते मनः.. (३२) हे इंद्र! तुम्हारे समान थोड़ा भी कर्म करने वाला व्यक्ति धरती पर प्रसिद्ध हो जाता है. तुम्हारा मन मेरे पास आवे. (३२) तवेदु ताः सुकीर्तयोऽसञ्चुत प्रशस्तयः. यदिन्द्र मृळयासि नः.. (३३) हे इंद्र! जिनके द्वारा तुम हमें सुखी करते हो, वे शोभन प्रसिद्धियां एवं स्तुतियां तुम्हारी ही रहें. (३३) मा न एकस्मिन्नागसि मा द्वयोरुत त्रिषु. वधीर्मा शूर भूरिषु.. (३४) हे शूर इंद्र! हमें एक, दो, तीन अथवा बहुत अपराध करने पर मत मारना. (३४) बिभया हि त्वावत उग्रदभिप्रभङ्गिणः. दस्मादहमृतीषहः.. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! तुम्हारे समान उग्र, शत्रुओं पर प्रहार करने वाले, पापों को क्षीण करने वाले एवं शत्रुओं की हिंसा करने वाले देव के कारण मैं भयरहित बनूं. (३५) मा सख्युः शूनमा विदे मा पुत्रस्य प्रभूवसो. आवृत्त्वद्भूतु ते मनः.. (३६) हे अधिक धन वाले इंद्र! मैं तुमसे तुम्हारे मित्र एवं पुत्र की वृद्धि की बात कहता हूं. तुम्हारा मन मुझसे न फिरे. (३६) को नु मर्या अमिथितः सखा सखायमब्रवीत्. जहा को अस्मदीषते.. (३७) हे मनुष्यो! इंद्र के अतिरिक्त कौन क्रोधरहित मित्र है जो अपने मित्र से कहे कि मैंने किसे मारा है एवं मुझसे कौन भागता है? (३७) एवारे वृषभा सुतेऽसिन्वन्भूर्यावयः. श्वघ्नीव निवता चरन्.. (३८) हे कामपूरक इंद्र! एवार नामक व्यक्ति द्वारा निचोड़ा गया सोम उसे बहुत धन न देकर धूर्त के समान तुम्हारे पास आता है. सभी देव नीचे मुंह करके निकल गए. (३८) आ त एता वचोयुजा हरी गृभ्णे सुमद्रथा. यदीं ब्रह्मभ्य इददः.. (३९) हे इंद्र! मैं वचनमात्र से रथ में जुड़ने वाले एवं शोभन रक्षायुक्त तुम्हारे हरि नामक अश्वों को अपने सामने लाने के लिए हाथों से खींचता हूं. तुम ब्राह्मणों को धन देते हो. (३९) भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४०) हे इंद्र! तुम सभी शत्रुसेनाओं का भेदन करो, शत्रुओं की हिंसा करो, युद्ध को बंद करो एवं हमें अभिलषणीय धन दो. (४०) यद्दीळाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पर्शानि पराभृतम्. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४१) हे इंद्र! तुमने जो अभिलषणीय धन दृढ़-स्थान, स्थिर-स्थान व संदिग्ध-स्थान में रखा है, वह हमारे लिए लाओ. (४१) यस्य ते विश्वमानुषो भूरेर्दत्तस्य वेदति. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४२) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ जो धन सब मनुष्य जानते हैं, उस अभिलषणीय धन को हमारे पास लाओ. (४२) सूक्त—४६ देवता—इंद्र आदि त्वावतः पुरूवसो वयमिन्द्र प्रणेतः. स्मसि स्थातर्हरीणाम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अधिक धन वाले व यज्ञकर्म के पार ले जाने वाले इंद्र! हम तुम्हारे समान व्यक्ति के आश्रित हैं. तुम हरि नामक घोड़ों के स्वामी हो. (१) त्वां हि सत्यमद्रिवो विद्म दातारमिषाम्. विद्म दातारं रयीणाम्.. (२) हे वज्रधारी इंद्र! यह बात सत्य है कि हम तुम्हें अन्नों एवं धनों का दाता जानते हैं. (२) आ यस्य ते महिमानं शतमूते शतक्रतो. गीर्भिर्गृणन्ति कारवः.. (३) हे असंख्य रक्षासाधनों वाले एवं बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! स्तोता तुम्हारी महिमा को स्तुतियों द्वारा गाते हैं. (३) सुनीथो घा स मर्त्यो यं मरुतो यमर्यमा. मित्रः पान्त्यद्रुहः.. (४) वही मनुष्य यज्ञसंपन्न होता है, जिसकी रक्षा द्रोहरहित मरुद्गण, अर्यमा एवं मित्र करते हैं. (४) दधानो गोमदश्ववत्सुवीर्यमादित्यजूत एधते. सदा राया पुरुस्पृहा.. (५) आदित्य द्वारा अनुगृहीत यजमान गायों एवं अश्वों से युक्त होकर तथा शोभनवीर्य वाली संतान धारण करता हुआ बहुतों द्वारा अभिलषित धन के साथ बढ़ता है. (५) तमिन्द्रं दानमीमहे शवसानमभीर्वम्. ईशानं राय ईमहे.. (६) हम प्रसिद्ध, शक्तिशाली, भीरुतारहित एवं सबके स्वामी इंद्र से देने योग्य धन मांगते हैं. (६) तस्मिन्हि सन्त्यूतयो विश्वा अभीरवः सचा. तमा वहन्तु सप्तयः पुरूवसुं मदाय हरयः सुतम्.. (७) सब जगह जाने वाली, भीरुतारहित एवं सहायक मरुत्सेना इंद्र की है. गतिशील हरि नामक अश्व बहुत धन वाले इंद्र को निचोड़े हुए सोमरस के निकट प्रसन्नता के लिए ले आवे. (७) यस्ते मदो वरेण्यो य इन्द्र वृत्रहन्तमः. य आददिः स्व१र्नृभिर्यः पृतनासु दुष्टरः.. (८) हे इंद्र! तुम्हारा मद वहन करने योग्य है. जो युद्ध में शत्रुओं का अधिक वध करने वाला है. उसीके द्वारा तुम शत्रुओं से धन छीनते हो. वह मद युद्धों में बड़ी कठिनाई से पार किया जाता है. (८) यो दुष्टरो विश्ववार श्रवाय्यो वाजेष्वस्ति तरुता. ebook converter DEMO Watermarks*

स नः शविष्ठ सवना वसो गहि गमेम गोमति व्रजे.. (९) हे सबके वरण करने योग्य, वासस्थान देने वाले एवं अतिशय शक्तिशाली इंद्र! युद्धों में दुःख से तरने योग्य व शत्रुतारक मद के साथ हमारे यज्ञ में आओ. हम गायों वाली गोशाला में जाएंगे. (९) गव्यो षु णो यथा पुराश्व्योत रथया. वरिवस्य महामह.. (१०) हे महाधन वाले इंद्र! हमारे मन में पहले जिस प्रकार गाय, अश्व एवं रथ की अभिलाषा होने पर तुमने उसे पूरा किया था, उसी प्रकार हमें अब भी देना है. (१०) नहि ते शूर राधसोऽन्तं विन्दामि सत्रा. दशस्या नो मघवन्नू चिदद्रिवो धियो वाजेभिरावित्थ.. (११) हे इंद्र! यह बात सत्य है कि मैं तुम्हारे धन का अंत नहीं जानता हूं. हे धनी एवं वज्र वाले इंद्र! हमें शीघ्र धन दो एवं अन्नों द्वारा हमारे यज्ञकर्मों की रक्षा करो. (११) य ऋष्वः श्रावयत्सखा विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः. तं विश्वे मानुषा युगेन्द्रं हवन्ते तविषं यतस्रुचः.. (१२) जो इंद्र दर्शनीय, ऋत्विज् रूपी मित्रों से युक्त, बहुतों द्वारा स्तुत एवं संसार के सभी प्राणियों को जानते हैं, सब लोग हवि हाथ में लेकर उन्हीं शक्तिशाली इंद्र को सदा बुलाते हैं. (१२) स नो वाजेष्वविता पुरूवसुः पुनः स्थाता. मघवा वृत्रहा भुवत्.. (१३) वे बहुत धन वाले, धनसंपन्न एवं वृत्रहंता इंद्र युद्धों में रक्षा एवं आगे स्थित रहने वाले हों. (१३) अभि वो वीरमन्धसो मदेषु गाय गिरा महा विचेतसम्. इन्द्रं नाम श्रुत्यं शाकिनं वचो यथा.. (१४) हे स्तोताओ! तुमसे जिस छंद में संभव हो, उसी में सोम का नशा हो जाने पर वीर, शत्रुओं को हराने वाले, विशिष्ट बुद्धिसंपन्न, सर्वत्र प्रसिद्ध व शक्तिशाली इंद्र की स्तुति महान् वाक्यों द्वारा करो. (१४) ददी रेक्णस्तन्वे ददिर्वसु ददिर्वाजेषु पुरुहूत वाजिनम्. नूनमथ.. (१५) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम इसी समय मेरे शरीर को बल देने वाले बनो. तुम युद्धों में अन्नयुक्त धन दो तथा हमारे पुत्र आदि को धन दो. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

विश्वेषामिरज्यन्तं वसूनां सासह्वांसं चदिष्य वर्पसः. कृपयतो नूनमत्यथ.. (१६) समस्त संपत्तियों के स्वामी, शत्रुओं को रोकने वाले, युद्ध में शत्रु को कंपित करने वाले एवं हराने वाले इंद्र की स्तुति करो. इंद्र शीघ्र धन देंगे. (१६) महः सु वो अरमिषे स्तवामहे मीळहुषे अरङ्कमाय जग्मये. यज्ञेभिर्गीर्भिर्विश्वमनुषां मरुतामियक्षसि गाये त्वा नमसा गिरा.. (१७) हे महान्, अभिलाषापूरक, सर्वत्र गमनशील, तीव्र गति वाले इंद्र! मैं तुम्हारे आने की इच्छा करता हूं. हे मरुतों के नेता एवं सब प्राणियों के स्वामी इंद्र! हम यज्ञों, स्तुतियों एवं नमस्कारों द्वारा तुम्हारे गुण गाते हैं. (१७) ये पातयन्ते अज्मभिर्गिरीणां स्नुभिरेषाम्. यज्ञं महिष्वणीनां सुम्रं तुविष्वणीनां प्राध्वरे.. (१८) जो मरुद्गण बादलों के बहने वाले एवं शक्तिकारक जलों के साथ गिरते हैं, उन्हीं महान् ध्वनि वाले मरुतों के निमित्त हम यज्ञ करेंगे एवं उनके द्वारा दिया हुआ सुख पावेंगे. (१८) प्रभङ्गं दुर्मतीनामिन्द्र शविष्ठा भर. रयिमस्मभ्यं युज्यं चोदयन्मते ज्येष्ठं चोदयन्मते.. (१९) हे इंद्र! तुम दुष्ट बुद्धि वालों को नष्ट करने वाले हो. हम तुमसे याचना करते हैं. हे अतिशय शक्तिशाली इंद्र! हमारे लिए उचित धन हमें दो. हे धन प्रेरित करने वाली बुद्धि से युक्त इंद्र देव! हमें उत्तम धन दो. (१९) सनितः सुसनितरुग्र चित्र चेतिष्ठ सूनृत. प्रासहा सम्राट् सहुरिं सहन्तं भुज्युं वाजेषु पूर्व्यम्.. (२०) हे दाता, उग्र, विचित्र, अतिशय-ज्ञानी, शोभन-सत्ययुक्त, शत्रुओं को हराने वाले एवं सबके स्वामी इंद्र! तुम शत्रु को हराने वाला, सहनशील, भोग योग्य तथा स्थायी धन हमें संग्राम में दो. (२०) आ स एतु य ईवदाँ अदेवः पूर्तमाददे. यथा चिद्दशो अश्व्यः पृथुश्रवसि कानीतेऽस्या व्युष्याददे.. (२१) वे अश्व के पुत्र वश यहां आवें, जो देव नहीं हैं एवं जिन्होंने कन्या के पुत्र पृथुश्रवा से धन प्राप्त किया था. (२१) षष्टिं सहस्राश्व्यस्यायुतासनमुष्ट्रानां विंशतिं शता. दश श्यावीनां शता दश त्र्यरुषीणां दश गवां सहस्रा.. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*

वश ने कहा—"मैंने अश्वपुत्र पृथुश्रवा से साठ हजार एवं दस हजार घोड़े, बीस सौ ऊंट, काले रंग की दस घोड़ियां एवं तीन जगहों पर भूरे रंग वाली दस हजार गाएं पाई हैं. (२२) दश श्यावा ऋधद्रयो वीतवारास आशवः. मश्रा नेमिं नि वावृतुः.. (२३) शत्रु को मारने वाले, अधिक वेग वाले व अति शक्तिशाली दस हजार काले रंग के घोड़े रथ का पहिया आगे खींचते हैं. (२३) दानासः पृथुश्रवसः कानीतस्य सुराधसः. रथं हिरण्ययं ददन् मंहिष्ठः सूरिरभूदृषिषमकृत श्रवः.. (२४) शोभन धन वाले, कन्यापुत्र पृथुश्रवा का दान यही है. उन्होंने सोने का रथ दिया है, अतिशय दाता एवं सबके प्रेरक पृथुश्रवा ने अधिक बढ़ी हुई कीर्ति प्राप्त की है. (२४) आ नो वायो महे तने याहि मखाय पाजसे. वयं हि ते चकृमा भूरि दावने सद्यश्चिन्महि दावने.. (२५) हे वायु! तुम महान् धन एवं पूज्य बल देने के लिए हमारे पास आओ. हम अधिक धन देने वाले तुम्हारी स्तुति उसी समय करते हैं. (२५) यो अश्वेभिर्वहते वस्त उस्रास्त्रिः सप्त सप्ततीनाम्. एभिः सोमेभिः सोमसुद्भिः सोमपा दानाय शुक्रपूतपाः.. (२६) हे सोमरस पीने वाले एवं दीप्ति तथा पवित्र सोमरस पीने वाले वायु! अश्वों द्वारा चलने वाले, गृह में निवास करने वाले एवं चौदह सौ सत्तर गायों के साथ चलने वाले पृथुश्रवा तुम्हें सोमरस देने के लिए ही सोमरस निचोड़ने वालों के साथ मिले हैं. (२६) यो म इमं चिदु त्मनामन्दच्चित्रं दावने. अष्ट्वे अक्षे नहुषे सुकृत्वनि सुकृत्तराय सुक्रतुः.. (२७) जो पृथुश्रवा दान की वस्तुओं—गायों, घोड़ों आदि के विषय में सोचकर मन ही मन प्रसन्न हुए थे, उन शोभन कर्म वाले ने अपने राज्य के अध्यक्षों—अष्ट्व, अक्ष, नहुष एवं सुकृत्य को उत्तम कर्म करने की आज्ञा दी. (२७) उचथ्ये३ वपुषि यः स्वराळुत वायो घृतस्नाः. अश्वेषितं रजेषितं शुनेषितं प्राज्म तदिदं नु तत्.. (२८) हे वायु! जो पृथुश्रवा उचथ्य एवं वयु नामक राजाओं से भी अधिक सुशोभित हैं एवं घृत के समान शुद्ध हैं, उन्होंने घोड़ों, गधों और कुत्तों पर लादकर जो अन्न भेजा है, वह यही है, यह सब तुम्हारी कृपा है. (२८) ebook converter DEMO Watermarks*

अध प्रियमिषिराय षष्टिं सहस्रासनम्. अश्वानामिन्न वृष्णाम्.. (२९) इस समय धन आदि का दान करने वाले राजा पृथुश्रवा की कृपा से मैंने घोड़ों के समान अभिलाषापूरक साठ हजार गायों को पाया. (२९) गावो न यूथमुप यन्ति वध्रय उप मा यन्ति वध्रयः.. (३०) गाएं जिस प्रकार अपने झुंड में जाती हैं, उसी प्रकार पृथुश्रवा द्वारा दिए हुए बधिया बैल मेरे पास आते हैं. (३०) अध यच्चारथे गणे शतमुष्ट्राँ अचिक्रदत्. अध श्वित्नेषु विंशतिं शता.. (३१) ऊंटों का समूह जिस समय वन को जा रहा था, उस समय पृथुश्रवा ने मुझे सौ ऊंट देने के लिए बुलाया था एवं मुझे देने के लिए वह बीस हजार गाएं भी लाए थे. (३१) शतं दासे बल्बूथे विप्रस्तरुक्ष आ ददे. ते ते वायविमे जना मदन्तीन्द्रगोपा मदन्ति देवगोपाः.. (३२) मुझ बुद्धिमान् ब्राह्मण ने गायों और अश्वों के रक्षक बल्बूथ नामक दास से सौ गाएं और सौ घोड़े पाए थे. हे वायु! ये सब लोग तुम्हारे हैं. वे इंद्र एवं देवों द्वारा सुरक्षित होकर प्रसन्न होते हैं. (३२) अध स्या योषणा मही प्रतीची वशमश्व्यम्. अधिरुक्मा वि नीयते.. (३३) इस समय महती पूज्या, सामने मुंह करके खड़ी, सोने के गहने पहने हुए एवं राजा पृथुश्रवा द्वारा मेरे लिए दान की गई युवती को अश्वपुत्र वश अर्थात् मेरे सामने लाया जा रहा है. (३३) सूक्त—४७ देवता—आदित्य महि वो महतामवो वरुण मित्र दाशुषे. यमादित्या अभि द्रुहो रक्षथा नेमघं नशदनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१) हे महान् मित्र एवं वरुण! हवि देने वाले यजमान की तुम जो रक्षा करते हो, वह महान् है. हे आदित्यो! तुम शत्रु के हाथ से जिस यजमान की रक्षा करते हो, उसे पाप नहीं छू सकता. तुम्हारी रक्षाएं उपद्रवरहित एवं शोभन हैं. (१) विदा देवा अघानामादित्यासो अपाकृतिम. पक्षा वयो यथोपरि व्य१स्मे शर्म यच्छतानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (२)

हे आदित्य देवो! तुम पापों को दूर करना जानते हो. पक्षी जिस प्रकार अपने बच्चों के ऊपर पंख फैला लेते हैं, उसी प्रकार तुम हमें सुख दो. तुम्हारी रक्षाएं उपद्रवरहित एवं शोभन हैं. (२) व्य१स्मे अधि शर्म तत्पक्षा वयो न यन्तन. विश्वानि विश्ववेदसो वरूथ्या मनामहेऽनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (३) हे आदित्यो! तुम्हारे पास पक्षियों के पंखों के समान जो सुख है, वह हमें दो. हे सब धन के स्वामी आदित्यो! हम तुमसे घर के उपयुक्त सभी संपत्तियां मांगते हैं. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (३) यस्मा अरासत क्षयं जीवातुं च प्रचेतसः. मनोर्विश्वस्य घेदिम आदित्या राय ईशतेऽनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (४) उत्तम बुद्धि वाले आदित्य जिस मनुष्य के लिए घर एवं जीवनोपयोगी अन्न देते हैं, उसे देने के लिए ये सभी धनों के स्वामी बन जाते हैं. इनकी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (४) परि णो वृणजन्नघा दुर्गाणि रथ्यो यथा. स्यामेदिन्द्रस्य शर्मण्यादित्यानामुतावस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (५) रथ वाले घोड़े जिस प्रकार बुरा मार्ग त्याग देते हैं, उसी प्रकार हमारे पाप हमें छोड़ दें. हम इंद्र एवं आदित्यों के रक्षासाधन प्राप्त करेंगे. इनकी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (५) परिह्वृतेदना जनो युष्मादत्तस्य वायति. देवा अदभ्रमाश वो यमादित्या अहेतनानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (६) हे शीघ्रगमन वाले देवो! तप आदि के नियमों से पीड़ित लोग ही तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन पाते हैं. तुम जिस यजमान को प्राप्त होते हो, वह अधिक धन पाता है. (६) न तं तिग्मं चन त्यजो न द्रासद्भि तं गुरु. यस्मा उ शर्म सप्रथ आदित्यासो अराध्वमनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (७) हे सब ओर से विशाल आदित्यो! जिस यजमान को तुम सुख देते हो, वह तीखे स्वभाव वाला होकर भी क्रोध से दुःखी नहीं होता और न उसे अपरिहार्य दुःख प्राप्त होता है. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (७) युष्मे देवा अपि ष्मसि युध्यन्तइव वर्मसु. यूयं महो न एनसो यूयमर्भार्दुरुष्यतानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (८) हे आदित्यो! योद्धा जिस प्रकार कवच की रक्षा में रहते हैं, उसी प्रकार हम तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*

सुरक्षा में रहेंगे. तुम हमें बड़े एवं छोटे पाप से बचाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित व शोभन है. (८) अदितिर्न उरुष्यत्वदितिः शर्म यच्छतु. माता मित्रस्य रेवतोऽर्यम्णो वरुणस्य चानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (९) अदिति हमारी रक्षा करें एवं हमें सुख दें. अदिति मित्र, धनस्वी अर्यमा एवं वरुण की माता हैं. अदिति की रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (९) यद्देवाः शर्म शरणं यद्भद्रं यदनातुरम्. त्रिधातु यद्गुरूथ्यं१ तदस्मासु वि यन्तनानेहसो व ऊतय सुऊतयो व ऊतयः.. (१०) हे आदित्यो! हमें शरण लेने योग्य, शरण के योग्य, सबके द्वारा सेवनीय, रोगरहित, तीन गुणों से युक्त एवं घर के अनुकूल सुख प्रदान करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१०) आदित्या अव हि ख्यताधि कूलादिव स्पशः. सुतीर्थमर्वतो यथानु नो नेषथा सुगमनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (११) हे आदित्यो! जिस प्रकार तट पर खड़ा हुआ व्यक्ति जल को देखता है, उसी प्रकार तुम हम निम्नस्थ लोगों को देखो. घोड़े को जिस प्रकार उत्तम घाट पर ले जाते हैं उसी प्रकार हमें शोभन मार्ग पर ले जाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (११) नेह भद्रं रक्षस्विने नावयै नोपया उत. गवे च भद्रं धेनवे वीराय च श्रवस्यतेऽनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१२) हे आदित्यो! हमसे द्वेष करने वाले शक्तिशाली को इस धरती पर सुख न मिले. तुम्हारा सुख गाय, नई ब्याई धेनु एवं अन्न की अभिलाषा रखने वाले शोभन पुत्र को प्राप्त हो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१२) यदाविर्यदपीच्यं१ देवासो अस्ति दुष्कृतम्. त्रिते तद्विश्वमाप्त्य आरे अस्मद्धातनानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१३) हे आदित्य देवो! जो छिपे हुए अथवा स्पष्ट पाप हैं, उन में से एक भी मुझ आप्त्यत्रित को न हो. मुझसे पापों को दूर रखो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१३) यच्च गोषु दुष्ष्वप्न्यं यच्चास्मे दुहितर्दिवः. त्रिताय तद्विभावर्याप्त्याय परा वहानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१४) हे स्वर्ण की पुत्री एवं विभावरी उषा! हमारी गायों में अथवा हम में जो दुःख छिपा है, ebook converter DEMO Watermarks*

वह मुझ आप्त्यत्रित के कल्याण के लिए दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१४) निष्कं वा घा कृणवते स्रजं वा दुहितर्दिवः. त्रिते दुष्वप्न्यं सर्वमाप्त्ये परि दद्मस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१५) हे स्वर्ग की पुत्री उषा! आभरण बनाने वाले सुनार अथवा माला बनाने वाले का जो दुःख है वह मुझ आप्त्यत्रित के पास से दूर चला जावे. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१५) तदन्नाय तदपसे तं भागमुपसेदुषे. त्रिताय च द्विताय चोषो दुष्वप्न्यं वहानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१६) हे उषा! मुझ आप्त्यत्रित द्वारा स्वप्न में मधु, खीर आदि भोजन पाने पर दुःस्वप्न का कष्ट दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१६) यथा कलां यथा शफं यथ ऋणं संनयामसि. एवा दुष्वप्न्यं सर्वमाप्त्ये सं नयामस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१७) हे उषा! जिस प्रकार यज्ञ में बलि दिए गए पशु के हृदय, खुर, सींग आदि अंग क्रम से लिए जाते हैं अथवा जिस प्रकार ऋण धीरे-धीरे दिया जाता है, उसी प्रकार आप्त्यत्रित के सभी बुरे स्थान धीरे-धीरे दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१७) अजैष्माद्यासनाम चाभूमानागसो वयम्. उषो यस्माद्दुष्वप्न्यादभैष्माप तदुच्छत्वनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१८) हे देवी उषा! आज हम जीतेंगे एवं पापरहित होंगे. आज हम सुख प्राप्त करेंगे. हम जिस बुरे स्वप्न से डर रहे हैं, उसके पाप से हमें बचाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१८) सूक्त—४८ देवता—सोम स्वादोर्भक्षि वयसः सुमेधाः स्वाध्यो वरिवोवित्तस्य. विश्वे यं देवा उत मर्त्यासो मधु ब्रुवन्तो अभि सञ्चरन्ति.. (१) शोभन-बुद्धि एवं अध्ययन से युक्त मैं अत्यंत पूजा प्राप्त करने वाले एवं स्वादिष्ट अन्न का भक्षण कर सकूं. विश्वेदेव एवं सभी मनुष्य उस अन्न को मधु कहते हुए घूमते हैं. (१) अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य. इन्दविन्द्रस्य सख्यं जुषाणः श्रौष्टीव धुरमनु राय ऋध्याः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*