ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1297, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! तुम्हारे समान उग्र, शत्रुओं पर प्रहार करने वाले, पापों को क्षीण करने वाले एवं शत्रुओं की हिंसा करने वाले देव के कारण मैं भयरहित बनूं. (३५) मा सख्युः शूनमा विदे मा पुत्रस्य प्रभूवसो. आवृत्त्वद्भूतु ते मनः.. (३६) हे अधिक धन वाले इंद्र! मैं तुमसे तुम्हारे मित्र एवं पुत्र की वृद्धि की बात कहता हूं. तुम्हारा मन मुझसे न फिरे. (३६) को नु मर्या अमिथितः सखा सखायमब्रवीत्. जहा को अस्मदीषते.. (३७) हे मनुष्यो! इंद्र के अतिरिक्त कौन क्रोधरहित मित्र है जो अपने मित्र से कहे कि मैंने किसे मारा है एवं मुझसे कौन भागता है? (३७) एवारे वृषभा सुतेऽसिन्वन्भूर्यावयः. श्वघ्नीव निवता चरन्.. (३८) हे कामपूरक इंद्र! एवार नामक व्यक्ति द्वारा निचोड़ा गया सोम उसे बहुत धन न देकर धूर्त के समान तुम्हारे पास आता है. सभी देव नीचे मुंह करके निकल गए. (३८) आ त एता वचोयुजा हरी गृभ्णे सुमद्रथा. यदीं ब्रह्मभ्य इददः.. (३९) हे इंद्र! मैं वचनमात्र से रथ में जुड़ने वाले एवं शोभन रक्षायुक्त तुम्हारे हरि नामक अश्वों को अपने सामने लाने के लिए हाथों से खींचता हूं. तुम ब्राह्मणों को धन देते हो. (३९) भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४०) हे इंद्र! तुम सभी शत्रुसेनाओं का भेदन करो, शत्रुओं की हिंसा करो, युद्ध को बंद करो एवं हमें अभिलषणीय धन दो. (४०) यद्दीळाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पर्शानि पराभृतम्. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४१) हे इंद्र! तुमने जो अभिलषणीय धन दृढ़-स्थान, स्थिर-स्थान व संदिग्ध-स्थान में रखा है, वह हमारे लिए लाओ. (४१) यस्य ते विश्वमानुषो भूरेर्दत्तस्य वेदति. वसु स्पार्हं तदा भर.. (४२) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ जो धन सब मनुष्य जानते हैं, उस अभिलषणीय धन को हमारे पास लाओ. (४२) सूक्त—४६ देवता—इंद्र आदि त्वावतः पुरूवसो वयमिन्द्र प्रणेतः. स्मसि स्थातर्हरीणाम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*