ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1296, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस अवसर पर इंद्र का पुरुषार्थ उद्दीप्त हुआ. (२६) सत्यं तत्तुर्वशे यदौ विदानो अह्नवाय्यम्. व्यानट् तुर्वणे शमि.. (२७) हे इंद्र! तुमने तुर्वश और यदु नामक राजाओं के प्रसिद्ध यज्ञकर्म को सच्चा जानकर उनकी प्रसन्नता के लिए उनके शत्रु अह्नवाय्य को संग्राम में घेरा था. (२७) तरणिं वो जनानां त्रदं वाजस्य गोमतः. समानमु प्र शंसिषम्.. (२८) हे स्तोताओ! तुम्हारे पुत्र-पौत्रादि के तारक, शत्रुनाशक, गायों से युक्त अन्न देने वाले एवं सबके प्रति समान इंद्र की मैं स्तुति करता हूं. (२८) ऋभुक्षणं न वर्तव उक्थेषु तुग्र्यावृधम्. इन्द्रं सोमे सचा सुते.. (२९) स्तोत्र उच्चारण के साथ सोमरस निचुड़ जाने पर एवं उक्थ मंत्रों का उच्चारण आरंभ होने पर मैं धन पाने के लिए महान् तथा जलवर्षक इंद्र की प्रशंसा करता हूं. (२९) यः कृन्तदिद्वि योन्यं त्रिशोकाय गिरिं पृथुम्. गोभ्यो गातुं निरेतवे.. (३०) जिन इंद्र ने त्रिलोक ऋषि की प्रार्थना पर जल निकलने के द्वार समान एवं विस्तृत मेघ को विच्छिन्न किया था, उन्हीं जलों के निकलने के लिए मार्ग बनाया था. (३०) यद्दधिषे मनस्यसि मन्दानः प्रेदियक्षसि. मा तत्करिन्द्र मृळय.. (३१) हे इंद्र! तुम प्रसन्न होकर जो शुभ वस्तु धारण करते हो, जिसकी पूजा करते हो, जो देते हो, वह हमारे लिए क्यों नहीं करते? तुम हमें सुखी करो. (३१) दभ्रं चिद्धि त्वावतः कृतं शृण्वे अधि क्षमि. जिगात्विन्द्र ते मनः.. (३२) हे इंद्र! तुम्हारे समान थोड़ा भी कर्म करने वाला व्यक्ति धरती पर प्रसिद्ध हो जाता है. तुम्हारा मन मेरे पास आवे. (३२) तवेदु ताः सुकीर्तयोऽसञ्चुत प्रशस्तयः. यदिन्द्र मृळयासि नः.. (३३) हे इंद्र! जिनके द्वारा तुम हमें सुखी करते हो, वे शोभन प्रसिद्धियां एवं स्तुतियां तुम्हारी ही रहें. (३३) मा न एकस्मिन्नागसि मा द्वयोरुत त्रिषु. वधीर्मा शूर भूरिषु.. (३४) हे शूर इंद्र! हमें एक, दो, तीन अथवा बहुत अपराध करने पर मत मारना. (३४) बिभया हि त्वावत उग्रदभिप्रभङ्गिणः. दस्मादहमृतीषहः.. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*