भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1331, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1331

हे शोभन-नासिका वाले एवं गृहस्वामी इंद्र! तुम रथरूपी घर में बैठो. वह रथ सोने का बना हुआ है, दीप्त, अनेक पहियों वाला, कुशलतापूर्वक चलने वाला एवं पापरहित है. हम दोनों उस रथ में मिलें. (१६) तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते. अर्थं चिदस्य सुधितं यदेतव आवर्तयन्ति दावने.. (१७) हव्य-अन्न धारण करने वाले लोग इस प्रकार विराजमान इंद्र की उपासना करते हैं. जब इंद्र को चलकर स्वयं आने एवं दान के योग्य स्तुतियां प्रेरित करती हैं, तब इंद्र का भली प्रकार स्थापित धन प्राप्त होता है. (१७) अनु प्रत्नस्यौकसः प्रियमेधास एषाम्. पूर्वामनु प्रयतिं वृक्त बर्हिषो हितप्रयस आशत.. (१८) प्रियमेध ऋषि के परिवार वाले लोगों ने देवों के पुराने स्थान अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त किया है, मुख्य दान के लक्ष्य से कुशों का विस्तार किया है तथा सोमरस आदि प्राप्त किया है. (१८) सूक्त—५९ देवता—इंद्र यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः. विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो यो वृत्रहा गृणे.. (१) मैं प्रजाओं के राजा, रथ द्वारा चलने वाले, गमन में निर्बाध, सभी सेनाओं को तारने वाले, ज्येष्ठ एवं वृत्रहंता इंद्र की स्तुति करता हूं. (१) इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि. हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः.. (२) हे पुरुहन्मा ऋषि! तुम अपनी रक्षा के लिए इंद्र को अलंकृत करो. तुम्हारे विधाता इंद्र का स्वभाव उग्र एवं कोमल दो प्रकार का है. इंद्र अपने हाथ में दर्शनीय एवं आकाश में सूर्य के समान दिखाई देने वाला वज्र धारण करते हैं. (२) नकिष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम्. इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्ण्वोजसम्.. (३) जो यज्ञसाधनों द्वारा सदा वृद्धि करने वाले, सबके स्तुतियोग्य, महान् अन्यों द्वारा पराभवरहित एवं सबको दबाने वाली शक्ति से युक्त इंद्र को यज्ञसाधनों द्वारा अपने अनुकूल बना लेते हैं, उनके कर्म में कोई व्यक्ति बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता. (३) ebook converter DEMO Watermarks*