भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1330, कुल 1855 में से

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जिस समय सफेद रंग की, शोभन जल देने वाली एवं बहुत अधिक बढ़ी हुई नदियां बहती हैं, उस समय तुम इंद्र के पीने के लिए सोमरस को ले जाओ. (१०) अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत. वरुण इदिह क्षयत्तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव.. (११) इंद्र ने सोमरस पिया एवं अग्नि ने सोमरस पिया. देवगण सोमरस पीकर तृप्त हुए. वरुण सोमरस पीने के लिए यज्ञशाला में निवास करें. गाएं जिस प्रकार बछड़े से मिलने दौड़ती हैं, उसी प्रकार उक्थ मंत्र वरुण की स्तुति करते हैं. (११) सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धव:. अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव.. (१२) हे वरुण! तुम शोभन देव हो. तुम्हारे समुद्ररूपी तालु में गंगा आदि सात नदियां इस प्रकार गिरती हैं जिस प्रकार सूर्य के सामने किरणें गिरती हैं. (१२) यो व्यतीँरफाणयत् सुयुक्ताँ उप दाशुषे. तक्वो नेता तदिद्वपुरुपमा यो अमुच्यत.. (१३) जो इंद्र विविध गमन वाले के रथ में भली प्रकार जुते हुए घोड़ों को हव्यदाता यजमान के पास जाने के लिए चलाते हैं, वे उपमा देने योग्य हैं, यज्ञ में आते हैं, यज्ञ के फल के नेता हैं एवं उदक उत्पन्न करते हैं. वे असुर आदि से मुक्त रहते हैं. (१३) अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विष:. भिनत्कनीन ओदनं पच्यमानं परो गिरा.. (१४) शक्र (इंद्र) युद्ध में सभी शत्रुओं का अतिक्रमण करके चलते हैं. वे सभी द्वेषियों को छोड़ देते हैं. सुंदर एवं मेघों के ऊपर वर्तमान इंद्र गर्जन एवं वज्र के शब्द से ताड़ित करके मेघों का भेदन करते हैं. (१४) अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम्. स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम्.. (१५) बालक के समान छोटे शरीर वाले कुमार इंद्र प्रशंसनीय रथ पर बैठते हैं. इंद्र महान् एवं माता-पिता के सामने इधरधर दौड़ने वाले मृगशावक के समान अनेक कर्मों वाले मेघ को वर्षा के लिए प्रेरित करते हैं. (१५) आ तू सुशिप्र दम्पते रथं तिष्ठा हिरण्ययम्. अध द्युक्षं सचेवहि सहस्रपादमरुषं स्वस्तिगामनेहसम्.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

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