ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1404, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्वानासो रथा इव दधन्विरे गभस्त्योः. भरासः कारिणामिव.. (२) रथ के समान यज्ञस्थल की ओर जाते हुए सोम को ऋत्विज् अपने हाथों में इस प्रकार धारण करते हैं, जिस प्रकार भारवाहक हाथों में भार उठाते हैं. (२) राजानो न प्रशस्तिभिः सोमासो गोभिरञ्जते. यज्ञो न सप्त धातृभिः.. (३) जिस प्रकार राजा प्रशंसाओं से व यज्ञ सात होताओं से प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार सोम गाय के दूध-दही आदि से मिलकर संस्कृत होते हैं. (३) परि सुवानास इन्दवो मदाय बर्हणा गिरा. सुता अर्षन्ति धारया.. (४) निचुड़ते हुए सोम स्तुतिरूपी महान् वचनों के साथ निचुड़कर प्रमत्त बनाने के लिए धारा के रूप में चलते हैं. (४) आपानासो विवस्वतो जनन्त उषसो भगम्. सूरा अण्वं वि तन्वते.. (५) इंद्र के मद पीने के स्थान के समान, उषा का भाग्य उत्पन्न करते हुए एवं नीचे गिरते हुए सोम शब्द करते हैं. (५) अप द्वारा मतीनां प्रत्ना ऋण्वन्ति कारवः. वृष्णो हरस आयवः.. (६) स्तुतियां करने वाले, पुराने एवं अभिलाषापूरक सोम को पीने वाले मनुष्य यज्ञ के द्वार को खोलते हैं. (६) समीचीनास आसते होतारः सप्तजामयः. पदमेकस्य पिप्रतः.. (७) उत्तम, सात भाइयों के समान और एकमात्र सोम का स्थान पूर्ण करने वाले सात होता यज्ञ में बैठते हैं. (७) नाभा नाभिं न आ ददे चक्षुश्चित्सूर्ये सचा. कवेरपत्यमा दुहे.. (८) मैं नाभि के समान यज्ञ के आधार सोम को अपनी नाभि में धारण करता हूं. हमारी आंखें सूर्य से मिलती हैं. मैं कविरूप सोम की धाराओं को दुहता हूं. (८) अभि प्रिया दिवस्पदमध्वर्युभिर्गुहा हितम्. सूरः पश्यति चक्षसा.. (९) शोभन-शक्ति वाले एवं दीप्तिशाली इंद्र अपने प्रिय सोम का हृदय में छिपा रहने पर भी आंख से देख सकते हैं. (९) सूक्त—११ देवता—पवमान सोम