भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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हे सोम! तुम अभिलाषापूरक एवं दीप्तिशाली हो. हे दीप्तिशाली एवं अभिलाषापूरक सोम! तुम देवों और मानवों के उपयोगी कर्मों को धारण करते हो. (१) वृष्णस्ते वृष्ण्यं शवो वृषा वनं वृषा मदः. सत्यं वृषन् वृषेदरसि.. (२) हे अभिलाषापूरक सोम! तुम्हारा बल, तुम्हारी सेवा एवं तुम्हारा मद अभिलाषापूरक है. तुम वास्तव में अभिलाषापूरक हो. (२) अश्वो न चक्रदो वृषा सं गा इन्दो समर्वतः. वि नो राये दुरो वृधि.. (३) हे अभिलाषापूरक सोम! तुम घोड़े के समान हिनहिनाते हो. तुम हमें गाएं एवं घोड़े दो और हमारे लिए धन के द्वार खोलो. (३) असृक्षत प्र वाजिनो गव्या सोमासो अश्व्या. शुक्रासो वीरयाशवः.. (४) ऋत्विजों ने शक्तिशाली, उज्ज्वल एवं वेगशाली सोम का निर्माण गायों, घोड़ों और संतान को पाने की अभिलाषा से किया है. (४) शुम्भमाना ऋतायुभिर्मृज्यमाना गभस्त्योः. पवन्ते वारे अव्यये.. (५) यज्ञाभिलाषी यजमानों द्वारा अलंकृत एवं दोनों हाथों से मसले जाते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर छनते हैं. (५) ते विश्वा दाशुषे वसु सोमा दिव्यानि पार्थिवा. पवन्तामान्तरिक्ष्या.. (६) वे सोम हव्य देने वाले यजमान के लिए द्युलोक, धरती एवं अंतरिक्ष में उत्पन्न सभी धन बरसावें. (६) पवमानस्य विश्ववित्प्र ते सर्गा असृक्षत. सूर्यस्येव न रश्मयः.. (७) हे सबको देखने वाले एवं छनते हुए सोम! तुम्हारी बनती हुई धारें इस समय सूर्य किरणों के समान चमकती हुई निर्मित होती हैं. (७) केतुं कृण्वन्दिवस्परि विश्वा रूपाभ्यर्षसि. समुद्रः सोम पिन्वसे.. (८) हे रस भरे हुए सोम! तुम हमारी पहचान करते हुए हमारे लिए सभी रूप अंतरिक्ष से बरसाओ एवं हमें भांति-भांति का धन दो. (८) हिन्वानो वाचमिष्यसि पवमान विधर्मणि. अक्रान्देवो न सूर्यः.. (९) हे छनते हुए सोम! जब तुम सूर्य देव के समान दशापवित्र पर पहुंचते हो, तब तुम प्रेरणा पाकर शब्द करते हो. (९) ebook converter DEMO Watermarks*