ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1455, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्दुः पविष्ट चेतनः प्रियः कवीनां मती. सृजदश्वं रथीरिव.. (१०) ज्ञान कराने वाले व देवों के प्रिय सोम क्रांतकर्म वाले स्तोताओं की स्तुतियां सुनकर पवित्र होते हैं. जैसे रथी घोड़े को चलाता है, उसी प्रकार सोम अपनी लहरें आगे बढ़ाते हैं. (१०) ऊर्मिर्यस्ते पवित्र आ देवावीः पर्यक्षरत्. सीदन्नृतस्य योनिमा.. (११) हे सोम! तुम्हारी देवाभिलाषिणी लहरें यज्ञ के स्थान में दशापवित्र पर बैठती हैं. (११) स नो अर्ष पवित्र आ मदो यो देववीतमः. इन्द्विन्द्राय पीतये.. (१२) हे दीप्तिशाली, नशीले एवं अतिशय देवाभिलाषी सोम! तुम इंद्र के पीने के लिए हमारे दशापवित्र पर गिरो. (१२) इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभिः. इन्दो रुचाभि गा इहि.. (१३) ऋत्विजों द्वारा मसले जाते हुए हे सोम! तुम हमें अन्न देने के लिए टपको एवं तेजस्वी अन्न के साथ हमारी गायों के समीप आओ. (१३) पुनानो वरिवस्कृध्यूर्जं जनाय गिर्वणः. हरे सृजान आशिरम्.. (१४) हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय, हरे रंग वाले, दूध में डाले जाते हुए एवं पवित्र होते हुए सोम! तुम यजमान को अन्न और धन दो. (१४) पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम्. द्युतानो वाजिभिर्यतः.. (१५) हे शक्तिशाली, यजमानों द्वारा गृहीत, यज्ञ के निमित्त शुद्ध होते हुए एवं दीप्तिशाली सोम! तुम इंद्र के स्थान पर जाओ. (१५) प्र हिन्वानास इन्दवोऽच्छा समुद्रमाशवः. धिया जूता असृक्षत.. (१६) वेगशाली एवं अंतरिक्ष की ओर प्रेरित सोम उंगलियों से आकृष्ट होकर निर्मित होते हैं. (१६) मर्मृजानास आयवो वृथा समुद्रमिन्दवः. अगमन्नृतस्य योनिमा.. (१७) मसले जाते हुए एवं गतिशील सोम बिना कारण ही अंतरिक्ष एवं जलपात्र की ओर जाते हैं. (१७) परि णो याह्यस्मयुर्विश्वा वसून्र्योजसा. पाहि नः शर्म वीरवत्.. (१८) हे हमें चाहने वाले सोम! तुम शक्ति द्वारा हमारे सभी धनों की रक्षा के लिए आओ तथा ebook converter DEMO Watermarks*