भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पृष्ठ 1475

जिस प्रकार रथ को युद्ध में भेजा जाता है, उसी प्रकार दोनों हाथों की दस उंगलियां सोम को यज्ञस्थल में भेजती हैं. स्तोता जिस समय सोम का स्थान बनाते हैं, उसी समय गाय का दूध सोम के पास जाता है. (५) श्येनो न योनिं सदनं धिया कृतं हिरण्ययमसदं देव एषति. ए रिणन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः.. (६) जिस प्रकार बाज पक्षी अपने निवास-स्थान को जाता है, उसी प्रकार दीप्तिशाली सोम यज्ञकर्मों द्वारा निर्मित एवं स्वर्णमय स्थान को जाते हैं. स्तोता यज्ञ में प्यारे सोम की स्तुति करते हैं. यज्ञ के योग्य सोम घोड़े के समान शीघ्रता से देवों के पास पहुंच जाते हैं. (६) परा व्यक्तो अरुषा दिवः कविर्वृषा त्रिपृष्ठो अनविष्ट गा अभि. सहस्रणीतिर्यतिः परायती रेभो न पूर्वीरुषसो वि राजति.. (७) दीप्तिशाली, बुद्धिमान् एवं स्पष्ट धाराओं वाले सोम दशापवित्र से द्रोणकलश में आते हैं. सोम अभिलाषापूरक, तीनों सवनों में रहने वाले, स्तुतियों के अनुकूल शब्द करने वाले, हजार आंखों वाले, पात्रों व कलशों में आने-जाने वाले एवं अनेक उषाओं में शब्द करते हुए सुशोभित होने वाले हैं. (७) त्वेषं रूपं कृणुते वर्णो अस्य स यत्राशयत्समृता सेधति स्रिधः. अप्सा याति स्वधया दैव्यं जनं सं सुष्टुती नसते सं गोअग्रया.. (८) सोम की शत्रुनिवारक किरण अपने रूप को दीप्तिशाली करती है. वह युद्ध में सोती है, शत्रुओं को रोकती है, जल देती हुई हव्य अन्न के साथ देवभक्त मनुष्य के पास आती है एवं शोभनस्तुतियों से मिलती है. सोम उन वाक्यों से मिलते हैं, जिनके द्वारा स्तोता गायों को पाने की प्रार्थना करता है. (८) उक्षेव यूथा परियन्नरावीदधि त्विषीरधित सूर्यस्य. दिव्यः सुपर्णोऽव चक्षत क्षां सोमः परि क्रतुना पश्यते जाः.. (९) जैसे गायों को देखकर सांड़ गरजता है, उसी प्रकार स्तुतियां सुनकर सोम शब्द करते हैं. सोम सूर्यकिरणों के रूप में द्युलोक में रहते हैं, द्युलोक में उत्पन्न एवं शोभन गति वाले हैं, धरती को देखते हैं एवं यज्ञ के द्वारा प्रजाओं को ज्ञान कराते हैं. (९) सूक्त—७२ देवता—पवमान सोम हरिं मृजन्त्यरुषो न युज्यते सं धेनुभिः कलशे सोमो अज्यते. उद्वाचमीरयति हिन्वते मती पुरुष्टुतस्य कति चित्परिप्रियः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*