ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
जिस प्रकार रथ को युद्ध में भेजा जाता है, उसी प्रकार दोनों हाथों की दस उंगलियां सोम को यज्ञस्थल में भेजती हैं. स्तोता जिस समय सोम का स्थान बनाते हैं, उसी समय गाय का दूध सोम के पास जाता है. (५) श्येनो न योनिं सदनं धिया कृतं हिरण्ययमसदं देव एषति. ए रिणन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः.. (६) जिस प्रकार बाज पक्षी अपने निवास-स्थान को जाता है, उसी प्रकार दीप्तिशाली सोम यज्ञकर्मों द्वारा निर्मित एवं स्वर्णमय स्थान को जाते हैं. स्तोता यज्ञ में प्यारे सोम की स्तुति करते हैं. यज्ञ के योग्य सोम घोड़े के समान शीघ्रता से देवों के पास पहुंच जाते हैं. (६) परा व्यक्तो अरुषा दिवः कविर्वृषा त्रिपृष्ठो अनविष्ट गा अभि. सहस्रणीतिर्यतिः परायती रेभो न पूर्वीरुषसो वि राजति.. (७) दीप्तिशाली, बुद्धिमान् एवं स्पष्ट धाराओं वाले सोम दशापवित्र से द्रोणकलश में आते हैं. सोम अभिलाषापूरक, तीनों सवनों में रहने वाले, स्तुतियों के अनुकूल शब्द करने वाले, हजार आंखों वाले, पात्रों व कलशों में आने-जाने वाले एवं अनेक उषाओं में शब्द करते हुए सुशोभित होने वाले हैं. (७) त्वेषं रूपं कृणुते वर्णो अस्य स यत्राशयत्समृता सेधति स्रिधः. अप्सा याति स्वधया दैव्यं जनं सं सुष्टुती नसते सं गोअग्रया.. (८) सोम की शत्रुनिवारक किरण अपने रूप को दीप्तिशाली करती है. वह युद्ध में सोती है, शत्रुओं को रोकती है, जल देती हुई हव्य अन्न के साथ देवभक्त मनुष्य के पास आती है एवं शोभनस्तुतियों से मिलती है. सोम उन वाक्यों से मिलते हैं, जिनके द्वारा स्तोता गायों को पाने की प्रार्थना करता है. (८) उक्षेव यूथा परियन्नरावीदधि त्विषीरधित सूर्यस्य. दिव्यः सुपर्णोऽव चक्षत क्षां सोमः परि क्रतुना पश्यते जाः.. (९) जैसे गायों को देखकर सांड़ गरजता है, उसी प्रकार स्तुतियां सुनकर सोम शब्द करते हैं. सोम सूर्यकिरणों के रूप में द्युलोक में रहते हैं, द्युलोक में उत्पन्न एवं शोभन गति वाले हैं, धरती को देखते हैं एवं यज्ञ के द्वारा प्रजाओं को ज्ञान कराते हैं. (९) सूक्त—७२ देवता—पवमान सोम हरिं मृजन्त्यरुषो न युज्यते सं धेनुभिः कलशे सोमो अज्यते. उद्वाचमीरयति हिन्वते मती पुरुष्टुतस्य कति चित्परिप्रियः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
ऋत्विज् हरे रंग वाले सोम को मसलते हैं, सोम की सेवा घोड़े के समान की जाती है. द्रोण में स्थित सोम गाय के दूध, दही से मिलाए जाते हैं. जब सोम शब्द करते हैं, तब स्तोता स्तुतियां करते हैं. इसके बाद सोम बहुत सी स्तुतियां करने वाले स्तोता को धन से प्रसन्न करते हैं. (१) साकं वदन्ति बहवो मनीषिण इन्द्रस्य सोमं जठरे यदादुहुः. यदी मृजन्ति सुगभस्तयो नरः सनीळाभिर्दशभिः काम्यं मधु.. (२) ऋत्विज् जब द्रोणकलशरूपी इंद्रजठर में सोम को दुहते हैं एवं शोभन बाहुओं वाले यज्ञकर्म के नेता अपनी दस उंगलियों से अभिलषणीय एवं नशीले सोम को मसलते हैं, उस समय बहुत से बुद्धिमान् स्तोता एक साथ स्तुतियां बोलते हैं. (२) अरममाणो अत्येति गा अभि सूर्यस्य प्रियं दुहितुस्तिरो रवम्. अन्वस्मै जोषमभरद्विनंगृसः सं द्वयीभिः स्वसृभिः क्षेति जामिभिः.. (३) देवों को प्रसन्न करने के लिए पात्रों में प्रवेश करने वाले सोम गोदुग्ध आदि को लक्ष्य करते हैं. वे सूर्य की प्रिय पुत्री उषा के स्वर का तिरस्कार करते हैं. स्तोता सोम की पर्याप्त स्तुति करता है. सोम दोनों भुजाओं से उत्पन्न एवं परस्पर मिली हुई गतिशील उंगलियों से मिलते हैं. (३) नृधूतो अद्रिषुतो बर्हिषि प्रियः पतिर्गवां प्रदिव इन्दुरृत्वियः. पुरन्धिवान्मनुषो यज्ञसाधनः शुचिर्धिया पवते सोम इन्द्र ते.. (४) हे इंद्र! यज्ञकर्म करने वाले मनुष्यों द्वारा शोभित, पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए, देवों को प्रसन्न करने वाले, गायों के स्वामी, पुराने पात्रों में गिरने वाले, ऋतु में उत्पन्न, अनेक यज्ञकर्मों वाले, मानवों के यज्ञ के साधन एवं दशापवित्र से शुद्ध सोम तुम्हारे लिए धारारूप में यज्ञ के पात्रों में गिरते हैं. (४) नृबाहुभ्यां चोदितो धारया सुतोऽनुष्वधं पवते सोम इन्द्र ते. आप्राः क्रतून्त्समजैरध्वरे मतीर्वेर्न दृषच्चम्वो३रासदद्धरिः.. (५) हे इंद्र! यज्ञकर्म के नेता मनुष्यों द्वारा प्रेरित एवं धारा के रूप में निचुड़ने वाले सोम तुम्हारा बल बढ़ाने के लिए आते हैं. तुम सोमरस पीकर यज्ञकर्मों को पूरा करते हो. तुमने यज्ञ में शत्रुओं को भली-भांति जीता है. हरे रंग वाले सोम चमू नामक पात्रों में इस प्रकार बैठते हैं, जिस प्रकार पक्षी वृक्ष पर बैठते हैं. (५) अंशुं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितं कविं कवयोऽपसो मनीषिणः. समी गावो मतयो यन्ति संयत ऋतस्य योना सदने पुनर्भुवः.. (६) कवि, कर्मवाले एवं बुद्धिमान् ऋत्विज् शब्द करते हुए, क्षीणतारहित एवं क्रांतकर्म वाले
सोम को निचोड़ते हैं. इसके बाद बार-बार उत्पन्न होने वाली गाएं एवं स्तुतियां परस्पर मिलकर यज्ञस्थान अर्थात् उत्तरवेदी सोम से मिलती हैं. (६) नाभा पृथिव्या धरुणो महो दिवोऽपामूर्मौ सिन्धुष्वन्तरुक्षितः. इन्द्रस्य वज्रो वृषभो विभूवसुः सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः.. (७) महान् द्युलोक को धारण करने वाले, धरती के नाभिरूप उत्तरवेदी पर स्थित, नदियों के जलों के भीतर छिपे हुए, इंद्र के वज्र के समान, अभिलाषा-पूरक व विस्तृत धन वाले सोम इंद्र के हित सुंदर मदकारक बनकर सुख के लिए जाते हैं. (७) स तू पवस्व परि पार्थिवं रजः स्तोत्रे शिक्षन्नाधून्वते च सुक्रतो. मा नो निर्भाग्वसुनः सादनस्पृशो रयिं पिशङ्गं बहुलं वसीमहि.. (८) हे शोभन-कर्म वाले सोम! तीनों सवनों में स्तुति करने वाले को धन देते हुए धरा लोक को लक्ष्य करके शीघ्र बरसो. तुम हमें घर, पुत्र आदि देने वाले धन से अलग मत करो. हम पीले रंग का विविध स्वर्णरूप धन प्राप्त करें. (८) आ तू न इन्दो शतदात्वश्व्यं सहस्रदातु पशुमद्धिरण्यवत्. उप मास्व बृहती रेवतीरिषोऽधि स्तोत्रस्य पवमान नो गहि.. (९) हे पवमान सोम! हमें अनेक दान वाला, अश्वसहित, हजारों दानों से युक्त, पशुओं सहित व स्वर्णयुक्त धन शीघ्र दो. तुम हमें पशुओं से युक्त अन्न दो. तुम हमारा स्तोत्र सुनने के लिए आओ. (९) सूक्त—७३ देवता—पवमान सोम स्रक्वे द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः. त्रीन्त्स मूर्ध्नो असुरश्चक्र आरभे सत्यस्य नावः सुकृतमपीपरन्.. (१) निचोड़े जाते हुए सोम की किरणें यज्ञ की ठोड़ी अर्थात् उत्तरवेदी पर मिलती हैं. सोमरस यज्ञ के उत्पत्ति स्थान में मिलते हैं. शक्तिशाली सोम उठे हुए तीनों लोकों को मानवों व देवों के चलने के लिए बनाते हैं. सत्यरूप सोम की नाव के समान स्थित चार थालियां शोभन कर्म वाले यजमान को मनचाहा सुख देकर पूजती हैं. (१) सम्यक् सम्यञ्चो महिषा अहेषत सिन्धोरूर्मोवधि वेना अवीविपन्. मधोर्धाराभिर्जनयन्तो अर्कमित्रियामिन्द्रस्य तन्वमवीवृधन्.. (२) पूजा के योग्य ऋत्विज् परस्पर मिलकर सोमरस को अच्छी तरह निचोड़ते हैं. इसके स्वर्ग आदि कर्मफल चाहने वाले ऋत्विज् सरिता के जल में सोम को कंपित करते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*
स्तोताओं ने पवित्र स्तुतियां बोलते हुए इंद्र के अतिशय प्रिय तेज को नशीले सोमरस की धाराओं से बढ़ाया है. (२) पवित्रवन्तः परि वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभि रक्षति व्रतम्. महः समुद्रं वरुणस्तिरो दधे धीरा इच्छेकुर्धरणेष्वारभम्.. (३) शुद्ध करने की शक्ति से युक्त सोमरस की किरणें माध्यमिका वाक् के चारों ओर बैठती हैं. इन किरणों के प्राचीन पिता सोम प्रकाशनरूप कर्म की रक्षा करते हैं. अपने तेज से सबको ढकने वाले सोम अपनी किरणों से अंतरिक्ष को ढकते हैं. धीर ऋत्विज् सबको धारण करने वाले जल में सोम को मिलाना आरंभ करते हैं. (३) सहस्रधारेऽव ते समस्वरन्दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः. अस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः.. (४) हजार धाराएं बरसाने वाले अंतरिक्ष में वर्तमान सोमरस की किरणें नीचे स्थित धरती को वृष्टियुक्त करती हैं. द्युलोक के ऊंचे स्थान में स्थित, मधुपूर्ण जीभ वाली एक-दूसरे से अलग सोमरस की अपनी किरणें तेज चलती हुई कभी पलक नहीं गिरातीं. इस प्रकार सोम की किरणें स्थान-स्थान पर पापियों को बाधा पहुंचाती हैं. (४) पितुर्मातुरध्या ये समस्वरन्नृचा शोचन्तः संदहन्तो अव्रतान्. इन्द्रद्विष्टामप धमन्ति मायया त्वचमसिक्नीं भूमनो दिवस्परि.. (५) द्यावा-पृथिवीरूपी माता-पिता से अधिक मात्रा में उत्पन्न होने वाली सोम की किरणें ऋत्विजों की स्तुतियों से दीप्ति होती हुई यज्ञकर्म न करने वालों को नष्ट करती हैं एवं इंद्र से द्वेष करने वाले व काले चमड़े वाले राक्षसों को अपनी बुद्धि द्वारा धरती एवं आकाश से दूर भगाती हैं. (५) प्रत्नान्मानादध्या ये समस्वरञ्छ्लोकयन्त्रासो रभसस्य मन्तवः. अपानक्षासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः.. (६) स्तुति के अनुसार चलने वाली एवं शीघ्रगति का अभिमान करने वाली सोम की किरणें प्राचीन अंतरिक्ष से एक साथ उत्पन्न हुई थीं. ज्ञान-दृष्टि से शून्य एवं देवों की स्तुतियां न सुनने वाले पापी लोग उन किरणों का त्याग कर देते हैं. पापी लोग सत्य के मार्ग से चलकर पार नहीं पहुंचते. (६) सहस्रधारे वितते पवित्र आ वाचं पुनन्ति कवयो मनीषिणः. रुद्रास एषामिषिरासो अद्रुहः स्पशः स्वञ्च सुदृशो नृचक्षसः.. (७) यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं बुद्धिमान् ऋत्विज् अनेक धाराओं वाले, विस्तृत एवं शुद्ध सोम में स्थित माध्यमिका वाणी की स्तुति करते हैं. गतिशील, स्तोताओं से द्रोह न करने वाले, ebook converter DEMO Watermarks*
शोभन गति वाले, नेता एवं देखने में सुंदर मरुद्गण माध्यमिका वाणी की स्तुति करने वालों के वश में हो जाते हैं। (७) ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतुस्त्री ष पवित्रा हृद्य१न्तरा दधे. विद्वान्तस विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान्विध्यति कर्ते अव्रतान्.. (८) यज्ञ के रक्षक एवं शोभन कर्म वाले सोम को कोई रोकता नहीं. सोम अपने हृदय में तीन पवित्रों—अग्नि, वायु एवं सूर्य को धारण करते हैं. सब कुछ जानने वाले सोम सब लोकों को देखते हैं एवं यज्ञकर्म न करने वाले अप्रिय लोगों को नीचे की ओर मुंह करके पीड़ित करते हैं. (८) ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया. धीराश्चित्तत्समिनक्षन्त आशतात्रा कर्तमव पदात्यप्रभुः.. (९) सत्यरूप यज्ञ का विस्तार करने वाले, दशापवित्र में फैले सोम वरुण की जीभ के अग्रभाग के समान जल में रहते हैं. यज्ञकर्म करने वाले उन सोम को पाते हैं. जो यज्ञकर्म करने में असमर्थ हैं, वे नरक में जाते हैं. (९) सूक्त—७४ देवता—पवमान सोम शिशुर्न जातोऽव चक्रदद्धने स्व१र्यद्द्वाज्यरुषः सिषासति. दिवो रेतसा सचते पयोवृधा तमीमहे सुमती शर्म सप्रथः.. (१) जल में उत्पन्न पवमान सोम नीचे की ओर मुंह करके बालक के समान रोते हैं. शक्तिशाली घोड़े के समान चलने वाले सोम स्वर्गलोक का सहारा लेना चाहते हैं. वे गायों एवं ओषधियों के रस के साथ स्वर्ग से धरती पर आते हैं. हम शोभन स्तुतियों के द्वारा उन सोम से धनसंपन्न घर मांगते हैं. (१) दिवो यः स्कम्भो धरुणः स्वातत आपूर्णो अंशुः पर्यैति विश्वतः. सेमे मही रोदसी यक्षदावृता समीचीने दाधार समिषः कविः.. (२) स्वर्गलोक को स्तंभित करने वाले, धरती के धारणकर्त्ता, सब जगह विस्तृत एवं पात्रों में भरे हुए सोम की किरणें चारों ओर जाती हैं. सोम ने विस्तृत द्यावा-पृथिवी को धारण किया था. यज्ञकर्म करने वाले सोम स्तोताओं को अन्न दें. (२) महि प्सरः सुकृतं सोम्यं मध्वीं गव्यूतिरदितेर्ऋतं यते. इशे यो वृष्टेरित उसियो वृषापां नेता य इतऊतिर्ऋग्मियः.. (३) यज्ञ में जाने वाले इंद्र के लिए भली-भांति संस्कृत एवं सोम मिला हुआ मधुर रस पीने ebook converter DEMO Watermarks*
योग्य होता है. हमारे यज्ञ में आने वाले इंद्र का मार्ग विस्तृत होता है. वे धरती पर गिरने वाली वर्षा के स्वामी हैं. दुधारू गायों के हितकारक, जल बरसाने वाले एवं यज्ञ के नेता इंद्र हमारे यज्ञ में जाने से स्तुतियोग्य होते हैं. (३) आत्मन्वन्नभो दुह्यते घृतं पय ऋतस्य नाभिरमृतं वि जायते. समीचीनाः सुदानवः प्रीणन्ति तं नरो हितमव मेहन्ति पेरवः.. (४) सोम आदित्यरूप आकाश से सारपूर्ण घी व दूध दुहते हैं. यज्ञ की नाभिरूप सोम से अमृत उत्पन्न होता है. शोभनदान वाले यजमान मिलकर सोम को प्रसन्न करते हैं. यज्ञ का नेतृत्व करने वाली एवं सबकी रक्षक सोमकिरणें धरती पर जल बरसाती हैं. (४) अरावीदंशुः सचमान ऊर्मिणा देवाव्यं१ मनुषे पिन्वति त्वचम्. दधाति गर्भमदितेरुपस्थ आ येन तोकं च तनयं च धामहे.. (५) जलसमूह में मिलाए जाते हुए सोम शब्द करते हैं एवं देवों का पालन करने वाले अपने शरीर को यजमान के कल्याण के लिए पात्रों में गिराते हैं. सोम अपनी किरणों द्वारा धरती पर उत्पन्न ओषधियों में गर्भधारण करते हैं. उसी गर्भ की सहायता से हम पुत्र और पौत्र पाते हैं. (५) सहस्रधारेऽव ता असश्चतस्तृतीये सन्तु रजसि प्रजावतीः. चतस्रो नाभो निहिता अवो दिवो हविर्भरन्तमृतं घृतश्चुतः.. (६) जल की अनेक धाराओं वाले स्वर्गलोक में वर्तमान, एक-दूसरे से मिली हुई एवं प्रजाओं को उत्पन्न करने वाली सोमकिरणें धरती पर गिरें. सोम ने उन चार किरणों को स्वर्ग के नीचे स्थापित किया है. जल बरसाने वाली वे किरणें देवों को हवि देती हैं एवं ओषधियों में अमृत भरती हैं. (६) श्वेतं रूपं कृणुते यत्सिषासति सोमो मीढवाँ असुरो वेद भूमनः. धिया शमी सचते सेमभि प्रवद्विवस्कवन्धमव दर्षदद्रिणम्.. (७) पात्र में पहुंचकर सोम पात्र का रूप उज्ज्वल कर देते हैं. अभिलाषापूरक एवं शक्तिशाली सोम स्तोताओं को बहुत धन देना जानते हैं, अपनी बुद्धि की सहायता से उत्तम कर्मों को प्राप्त करते हैं एवं आकाश में घिरे हुए जलपूर्ण मेघ को फाड़ते हैं. (७) अध श्वेतं कलशं गोभिरक्तं कार्ष्मन्ना वाज्यक्रमीतसस्वान्. आ हिन्विरे मनसा देवयन्तः कक्षीवते शतहिमाय गोनाम्.. (८) जिस प्रकार युद्ध में योद्धा से प्रेरित घोड़ा मनचाही दिशा को लांघ जाता है, उसी प्रकार सोम सफेद रंग वाले एवं जलपूर्ण कलश को लांघते हैं. देवों की कामना करने वाले ऋत्विज् सोम की स्तुतियां करते हैं. सोम ने अधिक चलने वाले कक्षीवान् ऋषि को पशु दिए थे. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—७५ देवता—पवमान सोम
अद्भिः सोम पपृचानस्य ते रसोऽव्यो वारं वि पवमान धावति. स मृज्यमानः कविभिर्मदिन्तम स्वदस्वेन्द्राय पवमान पीतये.. (९) हे पवमान सोम! जल में मिलने वाला तुम्हारा रस भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की ओर अनेक प्रकार से दौड़ता है. हे अतिशय नशीले सोम! तुम बुद्धिमान् ऋत्विजों द्वारा पवित्र होकर इंद्र के पीने हेतु स्वादिष्ट बनो. (९) सूक्त—७५ देवता—पवमान सोम अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते. आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विश्वञ्चमरुहद्विचक्षणः.. (१) अन्न के लिए हितकारी सोम संसार के प्रिय एवं नीचे बहने वाले जलों के चारों ओर टपकते हैं. महान् सोम जलों के भीतर बढ़ते हैं. सबको देखने वाले सोम महान् सूर्य के विशाल एवं सब ओर चलने वाले रथ पर चढ़ते हैं. (१) ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः. दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यं१ नाम तृतीयमधि रोचने दिवः.. (२) सत्यरूप यज्ञ की जिह्वा के समान सोम प्यारा एवं मादक रस टपकाते हैं. सोम शब्द करने वाले, इस यज्ञकर्म के पालक एवं राक्षसों द्वारा अपराजेय हैं. द्युलोक को दीप्त करने वाला सोम जब निचोड़ा जाता है, तब यजमान ऐसा नाम धारण करता है जिसे उसके माता- पिता भी नहीं जानते. (२) अव द्युतानः कलशाँ अचिक्रदन्नृभिर्येमानः कोश आ हिरण्यये. अभीमृतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजति.. (३) यज्ञ का दोहन करने वाले ऋत्विज् दीप्तिशाली एवं नेताओं द्वारा स्वर्णमय चमड़े पर रखे गए सोम को निचोड़ते हैं. सोम शब्द करते हुए द्रोणकलश की ओर जाते हैं. तीनों सवनों में वर्तमान सोम यज्ञ के दिन प्रातःकाल सुशोभित होते हैं. (३) अद्रिभिः सुतो मतिभिश्चनोहितः प्ररोचयन्नोदसी मातरा शुचिः. रोमाण्यव्या समया वि धावति मधोर्धारा पिन्वमाना दिवेदिवे.. (४) पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए, अन्न के लिए हितकारक एवं शुद्ध सोम जगत् का निर्माण करने वाली द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करके भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हैं एवं जल से मिली हुई मादक सोम की धार प्रतिदिन दशापवित्र पर गिरती है. (४) परि सोम प्र धन्वा स्वस्तये नृभिः पुनानो अभि वासयाशिरम्. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—७६ देवता—पवमान सोम
ये ते मदा आहनसो विहायसस्तेभिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम्.. (५) हे सोम! हमारे कल्याण के लिए चारों ओर दौड़ो. तुम यज्ञकर्म के नेताओं द्वारा पवित्र होकर दूध, दही को ढको. तुम्हारे जो शब्दयुक्त, शत्रुघातक एवं महान् रस हैं, उनके कारण इंद्र को प्रेरित करो कि वे हमें महान् धन दें. (५) सूक्त—७६ देवता—पवमान सोम धर्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः. हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजांसि कृणुते नदीष्वा.. (१) सबको धारण करने वाले, शोधन के योग्य, रसात्मक देवों के बल, ऋत्विजों द्वारा स्तुति योग्य, हरे रंग वाले, प्राणियों द्वारा उत्पन्न एवं सीखे हुए घोड़े के समान वेग वाले सोम स्वर्ग से टपकते हैं. (१) शूरो न धत्त आयुधा गभस्त्योः स्व१ः सिषासन्नथिरो गविष्टिषु. इन्द्रस्य शुष्ममीरयन्नपस्युभिरिन्दुहिन्वानो अज्यते मनीषिभिः.. (२) सोम वीर पुरुष के समान अपने दोनों हाथों में आयुध धारण करते हैं. सोम गायों को खोजने के संबंध में स्वर्ग में जाने की इच्छा से रथ वाले बने थे. इंद्र के बल को प्रेरित करते हुए सोम यज्ञकर्म के इच्छुक बुद्धिमानों द्वारा भेजे जाकर गाय के दूध में मिलाए जाते हैं. (२) इन्द्रस्य सोम पवमान ऊर्मिणा तविष्यमाणो जठरेष्वा विश. प्र णः पिन्व विद्युदभ्रेव रोदसी धिया न वाजाँ उप मासि शश्वतः.. (३) हे पवमान सोम! तुम बढ़ते हुए अपनी बहुत सी धाराओं द्वारा इंद्र के पेट में घुसो. बिजली जिस प्रकार बादलों का दोहन करती है, उसी प्रकार तुम अपने कर्मों द्वारा द्यावा- पृथिवी का दोहन करके हमें अधिक अन्न देते हो. (३) विश्वस्य राजा पवते स्वर्दृश ऋतस्य धीतिमृषिषाळवीवशत्. यः सूर्यस्यासिरेण मृज्यते पिता मतीनामसमष्टकाव्यः.. (४) जगत् के राजा सोम निचोड़ते हैं. स्वर्ग को देखने वाले इंद्र के कर्म ऋषियों से भी उत्तम है. सोम ने इंद्र के यज्ञकर्म की कामना की. सोम सूर्य की किरणों द्वारा शुद्ध होते हैं. हमारी स्तुतियों के पालनकर्त्ता सोम का कर्म कवियों से उत्कृष्ट है. (४) वृषेव यूथा परि कोशमर्षस्यपामुपस्थे वृषभः कनिक्रदत्. स इन्द्राय पवसे मत्सरिन्तमो यथा जेषाम समिथे त्वोतयः.. (५) हे अभिलाषापूरक सोम! जिस प्रकार बैल गायों के समूह में जाता है, उसी प्रकार तुम ebook converter DEMO Watermarks*
अंतरिक्ष में रहकर गर्जन करते हो एवं द्रोणकलश में आते हो. तुम अत्यंत नशीले बनकर इंद्र के लिए निचुड़ते हो. तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर हम युद्ध में विजयी बनें. (५) सूक्त—७७ देवता—पवमान सोम एष प्र कोशे मधुमाँ अचिक्रददिन्द्रस्य वज्रो वपुषो वपुष्टरः. अभीमृतस्य सुदुघा घृतश्चुतो वाश्रा अर्षन्ति पयसेव धेनवः.. (१) इंद्र के वज्र के समान, मधुर रस युक्त एवं बीजों को बोने वालों में श्रेष्ठ सोम द्रोणकलश में शब्द करते हैं. फलों का दोहन करने वाली, जल बरसाने वाली एवं शब्द करने वाली सोमकिरणें रंभाती हुई गायों के समान जाती हैं. (१) स पूर्व्यः पवते यं दिवस्परि श्येनो मथायदिषितस्तिरो रजः. स मध्व आ युवते वेविजान इत्कृशानोरस्तर्मनसाह बिभ्युषा.. (२) प्राचीन सोम निचुड़ते हैं. अपनी माता के द्वारा भेजा हुआ बाज पक्षी सोम को स्वर्ग से लाया था. सोम अपने मधुर रस को तीनों लोकों से अलग करते हैं. कृशानु नाम वाले धनुषधारी के बाणों से डरकर सोम इधर-उधर जाते हुए मधुर रस के साथ मिलते हैं. (२) ते नः पूर्वास उपरास इन्दवो महे वाजाय धन्वन्तु गोमते. ईक्षेण्यासो अह्यो३न चारवो ब्रह्मब्रह्म ये जुजुषुर्हविर्हविः.. (३) स्त्रियों के समान दर्शनीय, रमणीय, हव्य का भक्षण करने वाले, प्राचीन तथा आधुनिक सोम मुझ महान् गोस्वामी के पास अन्न पाने के लिए आवें. (३) अयं नो विद्वान्वनवद्वनुष्यत इन्दुः सत्राचा मनसा पुरुष्टुतः. इनस्र्य यः सदने गर्भमादधे गवामुरुब्जमभ्यर्षति व्रजम्.. (४) बहुत से लोगों द्वारा प्रशंसित व अग्नि की उत्तरवेदी पर वर्तमान सोम हमें मारने वाले शत्रुओं को जानकर मारें. सोम ओषधियों में गर्भ धारण करते हैं एवं हमारी दुधारू गायों के समूह की ओर जाते हैं. (४) चक्रिर्दिवः पवते कृत्व्यो रसो महाँ अदब्धो वरुणो हुरुग्यते. असावि मित्रो वृजनेषु यज्ञियोऽत्यो न यूथे वृषयुः कनिक्रदत्.. (५) सब कर्मों के कर्त्ता, कर्मकुशल, रसात्मक, अधिक गुण वाले व अपराजेय सोम इधर- उधर जाते हैं. विपत्ति आने पर सबके मित्र सोम शब्द करते हुए इस प्रकार बरसते हैं, जिस प्रकार घोड़ा घोड़ियों में जाता है. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—७८ देवता—पवमान सोम प्र राजा वाचं जनयन्नसिष्यददपो वसानो अभि गा इयक्षति. गृभ्णाति रिप्रमविरस्य तान्वा शुद्धो देवानामुप याति निष्कृतम्.. (१) दीप्तिशाली सोम शब्द उत्पन्न करते हुए निचुड़ते हैं एवं जल को आच्छादित करते हुए स्तुतियों को प्राप्त करते हैं. सोम का फोक भेड़ के बालों से बना दशापवित्र ग्रहण करता है. सोम शुद्ध होकर देवों के स्थान को जाते हैं. (१) इन्द्राय सोम परि षिच्यसे नृभिर्नृचक्षा ऊर्मि: कविरज्यसे वने. पूर्वीर्र्हि ते सुतय: सन्ति यातवे सहस्रमश्वा हरयश्चमूर्षद:.. (२) हे सोम! तुम ऋत्विजोँ द्वारा इंद्र के लिए निचोड़े जाते हो. हे मेधावी एवं यज्ञकर्त्ताओं को कृपापूर्वक देखने वाले सोम! तुम प्रेरित होकर जल में मिलते हो. तुम्हारे जाने के लिए बहुत से छिद्र हैं. तुम्हारी हजारों व्याप्त एवं हरे रंग वाली किरणें पत्थरों पर स्थित हैं. (२) समुद्रिया अप्सरसो मनीषिणमासीना अन्तरभि सोममक्षरन्. ता ईं हिन्वन्ति हर्म्यस्य सक्षणिं याचन्ते सुम्नं पवमानमक्षितम्.. (३) अंतरिक्ष में रहने वाली अप्सराएं यज्ञ में बैठकर मेधावी सोम को निचोड़ती हैं. वे यज्ञशाला को सींचने वाले सोम को बढ़ाती हैं एवं उससे अक्षय सुख की याचना करती हैं. (३) गोजिन्न: सोमो रथजिद्धिरण्वजित्स्वर्जिदब्जित्पवते सहस्रजित्. यं देवासश्चक्रिरे पीतये मदं स्वादिष्ठं द्रप्समरुणं मयोभुवम्.. (४) हमारे लिए गायों, रथ, स्वर्ण, स्वर्ग, जल एवं हजारों धनों के जेता सोम पवित्र किए जाते हैं. देवों ने नशीले, अत्यंत स्वादपूर्ण, रसात्मक, लाल रंग वाले एवं सुखद सोम को पीने के लिए बनाया है. (४) एतानि सोम पवमानो अस्मयु: सत्यानि कृण्वन्द्रविणान्यर्षसि. जहि शत्रुमन्तिके दूरके च य उर्वीं गव्यूतिमभयं च नस्कृधि.. (५) हे सोम! तुम इन धनों को हमें वास्तव में देते हुए, शुद्ध होते हुए शुद्ध होते हो. जो शत्रु समीप अथवा दूर स्थित हो, उसे मारो एवं हमारे मार्ग को विस्तृत करके हमें अभय दो. (५) सूक्त—७९ देवता—पवमान सोम अचोदसो नो धन्वन्त्विन्दव: प्र सुवानासो बृहद्दिवेषु हरय:. वि च नशन्न इषो अरातयोऽर्यो नशन्त सनिषन्त नो धिय:.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
विशाल दीप्ति वाले, यज्ञों में निचुड़ते हुए हरितवर्ण सोम अपने-आप हमारे पास आवें. हमें अन्न न देने वाले एवं शत्रु नष्ट हों. देवगण हमारे कर्मों को स्वीकार करें. (१) प्र णो धन्वन्त्विन्दवो मदच्युतो धना वा येभिर्वतो जुनीमसि. तिरो मर्तस्य कस्य चित्परिह्वृतिं वयं धनानि विश्वधा भरेमहि.. (२) मद टपकाने वाले सोम एवं धन हमारे पास आवें. इनकी सहायता से हम शक्तिशाली शत्रुओं को जीतें एवं प्रत्येक मनुष्य की बाधा को पार करके सदा धन प्राप्त करें. (२) उत स्वस्या अरात्या अरिहिं ष उतान्यस्या अरात्या वृको हि ष:. धन्वन्न तृष्णा समरीत ताँ अभि सोम जहि पवमान दुराध्य:.. (३) वे सोम अपने शत्रु के हननकर्त्ता और हमारे शत्रु के नाशक हैं. जैसे मरुस्थल में लोगों को प्यास घेरे रहती है, वैसे ही सोम शत्रुओं को घेरते हैं. हे सोम! इन दोनों प्रकार के शत्रुओं को मारो. (३) दिवि ते नाभा परमो य आददे पृथिव्यास्ते रुरुहुः सानवि क्षिप:. अद्रयस्त्वा बप्सति गोरधि त्वच्य१प्सु त्वा हस्तैर्दुदुहुर्मनीषिण:.. (४) हे सोम! तुम्हारे उत्तम अंश स्वर्ग में रहकर हव्य ग्रहण करते हैं एवं वहीं से धरती के ऊंचे स्थानों पर गिरकर वृक्ष बन गए हैं. पत्थर तुम्हारा भक्षण करते हैं एवं बुद्धिमान् लोग गाय के चमड़े पर हाथों से तुम्हारा रस निकालते हैं. (४) एवा त इन्दो सुभ्वं सुपेशसं रसं तुञ्जन्ति प्रथमा अभिश्रियः. निदंनिदं पवमान नि तारिष आविस्ते शुष्मो भवतु प्रियो मद:.. (५) हे सोम! प्रमुख अध्वर्युजन इस समय शोभन एवं सुंदर रस को निचोड़ते हैं. हे पवमान सोम! तुम हमारे प्रत्येक शत्रु को नष्ट करो. तुम्हारा शक्ति देने वाला, प्रिय एवं नशीला रस प्रकट हो. (५) सूक्त—८० देवता—पवमान सोम सोमस्य धारा पवते नृचक्षस ऋतेन देवान्हवते दिवस्परि. बृहस्पते रवथेना वि दिद्युते समुद्रासो न सवनानि विव्यचु:.. (१) यजमानों को देखने वाले सोम की धारा टपकती है. सोम यज्ञ के द्वारा द्युलोक के ऊपर वर्तमान देवों का हनन करते हैं. सोम स्तोता के शब्द से चमकते हैं एवं जिस तरह धरती को सागर घेरे हुए है, उसी प्रकार वे तीनों सवनों को व्याप्त करते हैं. (१) यं त्वा वाजिन्नघ्न्या अभ्यनूषतायोहतं योनिमा रोहसि द्युमान्. ebook converter DEMO Watermarks*
मघोनामायुः प्रतिरन्महि श्रव इन्द्राय सोम पवसे वृषा मदः.. (२) हे अन्नयुक्त सोम! किसी के द्वारा नष्ट न होने वाली स्तुतियां तुम्हारी प्रशंसा करती हैं. तुम दीप्तिशाली बनकर स्वर्णमय हाथों द्वारा संस्कृत स्थान की ओर बढ़ते हो. हे वर्षा करने वाले एवं नशीले सोम! तुम हव्य वाले यजमानों की आयु एवं महान् अन्न बढ़ाते हुए इंद्र के हेतु निचुड़ते हो. (२) इन्द्रस्य कुक्षा पवते मदिन्तम ऊर्जं वसानः श्रवसे सुमङ्गलः. प्रत्यङ् स विश्वा भुवनाभि पप्रथे क्रीळन्हरिरत्यः स्यन्दते वृषा.. (३) अत्यधिक नशीले, शक्तिदाता रस को ढकते हुए व शोभन कल्याण देने वाले सोम यजमान को अन्न देने के लिए इंद्र की कोख में निचुड़ते हैं. वे सभी प्राणियों को बढ़ाते हैं. वेदी पर क्रीड़ा करते हुए हरितवर्ण, गतिशील एवं बरसने वाले सोम टपकते हैं. (३) तं त्वा देवेभ्यो मधुमत्तमं नरः सहस्रधारं दुहते दश क्षिपः. नृभिः सोम प्रच्युतो ग्रावभिः सुतो विश्वान्देवाँ आ पवस्वा सहस्रजित्.. (४) हे सोम! मनुष्य एवं उनकी दस उंगलियां देवों के लिए अत्यंत मधुर एवं हजारों धाराओं वाले सोम को दुहती हैं. हे सोम! तुम मनुष्यों द्वारा पत्थरों की सहायता से निचुड़कर एवं हजारों धनों को जीतकर देवों को तृप्त करो. (४) तं त्वा हस्तिनो मधुमन्तमद्रिभिर्दुहन्त्यप्सु वृषभं दश क्षिपः. इन्द्रं सोम मादयन्दैव्यं जनं सिन्धोरिवोर्मिः पवमानो अर्षसि.. (५) सुंदर हाथों वाले लोगों की दस उंगलियां पत्थरों की सहायता से मधुर रस वाले एवं अभिलाषापूरक सोम को दुहती हैं. हे सोम! तुम निचुड़ते हुए तथा इंद्र एवं अन्य देवों को प्रसन्न करते हुए सागर की लहरों के समान जाते हो. (५) सूक्त—८१ देवता—पवमान सोम प्र सोमस्य पवमानस्योर्मय इन्द्रस्य यन्ति जठरं सुपेशसः. दध्ना यदिमुन्नीता यशसा गवां दानाय शूरमुदमन्दिषुः सुताः.. (१) जब निचोड़े हुए सोम गायों की शक्तिरूप दही के साथ मिलकर यजमान की अभिलाषा पूरी करने के लिए शूर इंद्र को उन्मत्त करते हैं, तब शुद्ध सोम की सुंदर लहरें इंद्र के पेट में जाती हैं. (१) अच्छा हि सोमः कलशाँ असिष्यददत्यो न वोळ्हा रघुवर्तनिर्वृषा. अथा देवानामुभयस्य जन्मनो विद्वाँ अश्रोत्यमृत इतश्च यत्.. (२)
सोम रथ खींचने वाले घोड़े के समान द्रोणकलश के सामने जाते हैं. शीघ्रगति वाले एवं अभिलाषापूरक सोम देवों के दोनों जन्मों को जानते हुए इस धरती एवं द्युलोक में यज्ञ को व्याप्त करते हैं. (२) आ नः सोम पवमानः किरा वस्विन्दो भव मघवा राधसो महः. शिक्षा वयोधो वसवे सु चेतुना मा नो गयमारे अस्मत्परा सिचः.. (३) हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमें गो आदि धन सब ओर से दो. हे दीप्तिशाली एवं धनी सोम! तुम हमें महान् धन दो. हे धारण करने वाले सोम! मुझ सेवक के लिए अपने उत्तम ज्ञान के द्वारा सुख दो एवं हमें देने योग्य धन हमसे दूर मत करो. (३) आ नः पूषा पवमानः सुरातयो मित्रो गच्छन्तु वरुणः सजोषसः. बृहस्पतिर्मरुतो वायुरश्विना त्वष्टा सविता सुयमा सरस्वती.. (४) शोभन दान करने वाले पूषा, सोम, मित्र, वरुण, बृहस्पति, मरुत्, वायु, अश्विनीकुमार, त्वष्टा, सविता एवं शोभन शरीर वाली सरस्वती मिलकर हमारे यज्ञ में आवें. (४) अभे द्यावापृथिवी विश्वमिन्वे अर्यमा देवो अदितिर्विधाता. भगो नृशंस उर्व१न्तरिक्षं विश्वे देवाः पवमानं जुषन्त.. (५) सर्वव्यापक द्यावा-पृथिवी, अर्यमा देव, अदिति, विधाता, प्रशंसनीय भग, विस्तृत अंतरिक्ष एवं विश्वेदेव निचुड़ते हुए सोम का सेवन करें. (५) सूक्त-८२ देवता-पवमान सोम असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्. पुनानो वारं पर्येत्यव्ययं श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदम्.. (१) दीप्तिशाली, वर्षा करने वाले एवं हरितवर्ण सोम निचोड़े गए. राजा के समान दर्शनीय सोम जल को लक्ष्य करके शब्द करते हैं. सोम शुद्ध होकर भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की ओर ऐसे जाते हैं. जैसे बाज अपने घोंसले की ओर जाता है. सोम अपने जलपूर्ण स्थान की ओर निचुड़ते हैं. (१) कविर्वेधस्या पर्येषि माहिनमत्यो न मृष्टो अभि वाजमर्षसि. अपसेधन्दुरिता सोम मृळय घृतं वसानः परि यासि निर्णिजम्.. (२) हे क्रांतदर्शी सोम! तुम यज्ञ करने की इच्छा से पूजनीय दशापवित्र की ओर जाते हो एवं जल से धुलकर युद्ध में जाने वाले घोड़े के समान चलते हो. हे सोम! तुम जल में मिलकर दशापवित्र की ओर जाते हो. तुम हमारे सभी पापों को नष्ट करके हमें सुखी करो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
पर्जन्यः पिता महिषस्य पर्णिनो नाभा पृथिव्या गिरिषु क्षयं दधे. स्वसार आपो अभि गा उतासरन्त्सं ग्रावभिर्नसते वीते अध्वरे.. (३) महान् एवं पत्तों वाले सोम के पिता मेघ हैं. वे सोम धरती की नाभि के समान पर्वतों के पत्थरों पर रहते हैं. उंगलियां गायों का दूध जल के पास ले जाती हैं. सोम शोभन यज्ञ में पत्थरों के साथ मिलते हैं. (३) जायेव पत्यावधि शेव मंहसे पज्ज्राया गर्भं शृणुहि ब्रवीमि ते. अन्तर्वाणीषु प्र चरा सु जीवसेऽनिन्द्यो वृजने सोम जागृहि.. (४) हे धरती के पुत्र सोम! मैं जो स्तुतियां बोलता हूं, उन्हें सुनो. पत्नी जैसे अपने पति को सुख देती है, उसी प्रकार तुम यजमान को सुख देते हो. तुम हमारे जीवन के लिए हमारी स्तुतियों के मध्य गतिशील बनो. हे स्तुति योग्य सोम! तुम हमारे शक्तिशाली शत्रुओं के प्रति सावधान रहना. (४) यथा पूर्वेभ्यः शतसा अमृध्रः सहस्रसाः पर्यया वाजमिन्दो. एवा पवस्व सुविताय नव्यसे तव व्रतमन्वापः सचन्ते.. (५) हे सोम! तुमने जिस प्रकार पूर्ववर्ती महर्षियों को सैकड़ों एवं हजारों संपत्तियां दी थीं, उसी प्रकार इस समय हमारी नवीन उन्नति के लिए टपको. जल तुम्हारे कर्म के लिए तुमसे मिलते हैं. (५) सूक्त—८३ देवता—पवमान सोम पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः. अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इदृहन्तस्तत्समाशत.. (१) हे मंत्रों के स्वामी सोम! तुम्हारा पवित्र अंश सब जगह विस्तृत है. तुम प्रभु बनकर पीने वाले के अंगों में फैल जाते हो. तुम्हारे पवित्र अंश को तपस्यारहित एवं अपरिपक्व व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता. परिपक्व एवं यज्ञ करने वाले लोग ही तुम्हारे पवित्र अंश को प्राप्त करते हैं. (१) तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदे शोचन्तो अस्य तन्तवो व्यस्थिरन्. अवन्त्यस्य पवीतारमाशवो दिवस्पृष्ठमधि तिष्ठन्ति चेतसा.. (२) शत्रुओं को कष्ट देने वाले सोम का पवित्र अंश द्युलोक के ऊंचे स्थान पर विस्तृत है। उसकी तेजस्वी किरणें विविध प्रकार से स्थित होती हैं. सोम का शीघ्रगामी रस यजमान की रक्षा करता है. इसके बाद वह देवों के समीप जाने वाली बुद्धि से स्वर्ग के ऊंचे स्थान में मिलता है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा बिभर्ति भुवनानि वाजयुः. मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः.. (३) सूर्य से संबंधित एवं प्रमुख सोम दीप्तिशाली बनते हैं. जल बरसाने वाले सोम अन्न की इच्छा करते हुए प्राणियों को पुष्ट करते हैं. इन बुद्धिमान् सोम की बुद्धि द्वारा मनुष्यों को देखने वाले देव संसार को बनाते हैं एवं पालक देव ओषधियों में गर्भ धारण करते हैं. (३) गन्धर्व इत्था पदमस्य रक्षति पाति देवानां जनिमान्यद्भुतः. गृभ्णाति रिपुं निधया निधापतिः सुकृत्तमा मधुनो भक्षमाशत.. (४) जल के धारणकर्त्ता आदित्य सोम के स्थान की रक्षा करते हैं. अद्भुत सोम देवों के जन्मों की रक्षा करते हैं एवं पाशों के स्वामी बनकर हमारे शत्रु को पाशों में जकड़ते हैं. अतिशय पुण्यशाली लोग मधुर सोम का रस पान करते हैं. (४) हविर्हविष्मो महि सद्म दैव्यं नभो वसानः परि यास्यध्वरम्. राजा पवित्ररथो वाजमारुहः सहस्रभृष्टिर्जयसि श्रवो बृहत्.. (५) हे जलयुक्त सोम! तुम जल को आच्छादित करते हुए विशाल यज्ञशाला में जाते हो. हे पवित्र रथ वाले राजा सोम! तुम युद्ध में जाते हो. हे अपरिमित गमन वाले सोम! तुम हमारे लिए बहुत सा अन्न जीतते हो. (५) सूक्त—८४ देवता—पवमान सोम पवस्व देवमादनो विचर्षणिर्प्स इन्द्राय वरुणाय वायवे. कृधी नो अद्य वरिवः स्वस्तिमदुरुक्षितौ गृणीहि दैव्यं जनम्.. (१) हे देवों को प्रसन्न करने वाले, विशेषद्रष्टा एवं जल देने वाले सोम! तुम इंद्र, वरुण एवं वायु के लिए टपको, हमें विनाशरहित धन दो एवं इस विशाल धरती पर मुझे देवों का भक्त कहकर पुकारो. (१) आ यस्तस्थौ भुवनान्यमर्त्यो विश्वानि सोमः परि तान्यर्षति. कृण्वन्त्सञ्चतं विचृतमभिष्टय इन्दुः सिषक्त्युषसं न सूर्यः.. (२) जो मरणरहित सोम भुवनों में व्याप्त हैं एवं सभी लोकों की चारों ओर से रक्षा करते हैं, वही सोम यज्ञ को फलयुक्त असुरों से विमुख करते हुए इस प्रकार उसी यज्ञ का सहारा लेते हैं, जैसे सूर्य विश्व को प्रकाशित करके उसी का सहारा लेते हैं. (२) आ यो गोभिः सृज्यत ओषधीष्वा देवानां सुम्न इषयन्नुपावसुः. आ विद्युता पवते धारया सुत इन्द्रं सोमो मादयन्दैव्यं जनम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
जो देवों के सुख के निमित्त चंद्रकिरणों द्वारा ओषधियों में स्थापित किए जाते हैं, वे देवों के समीप जाने के इच्छुक, शत्रुओं से धन प्राप्त करने वाले सोम सभी देवों के साथ इंद्र को प्रसन्न करते हैं एवं दीप्तियुक्त धारा के साथ निचोड़ते हैं. (३) एष स्य सोमः पवते सहस्रजिद्विन्वानो वाचमिषिरामुषर्बुधम्. इन्दुः समुद्रमुदियर्ति वायुभिरेन्द्रस्य हार्दि कलशेषु सीदति.. (४) हजारों धनों के नेता सोम स्तोत्रों के प्रति जाने वाली व प्रातःकाल प्रबुद्ध वाणी को प्रेरित करते हुए पवित्र होते हैं एवं वायु द्वारा प्रेरित होकर इंद्र के प्रिय द्रोणकलश में जाते हैं. (४) अभि त्यं गावः पयसा पयोवृधं सोमं श्रीणन्ति मतिभिः स्वर्विदम्. धनञ्जयः पवते कृत्व्यो रसो विप्रः कविः काव्येना स्वर्र्चनाः.. (५) दूध बढ़ाने वाले सोम को अपने दूध से भिगोने के लिए गाएं आती हैं. सोम स्तुतियां सुनकर सब कुछ प्रदान करते हैं. कर्म करने में कुशल, रसयुक्त, मेधावी, कवि, अन्नयुक्त एवं शत्रु का धन जीतने वाले सोम यज्ञकर्म द्वारा शुद्ध होते हैं. (५) सूक्त—८५ देवता—पवमान सोम इन्द्राय सोम सुषुतः परि स्रवाऽपामीवा भवतु रक्षसा सह. मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनो द्रविणस्वन्त इह सन्त्विन्दवः.. (१) हे सोम! तुम भली प्रकार निचोड़कर इंद्र के लिए सब ओर जाओ. राक्षसों के साथ-साथ हमारे रोग भी दूर हों. पापी लोग तुम्हारा रस पीकर प्रमुदित न हों. इस यज्ञ में तुम्हारे रस धनयुक्त हों. (१) अस्मान्त्समर्ये पवमान चोदय दक्षो देवानामासि हि प्रियो मदः. जहि शत्रूँरभया भन्दनायतः पिबेन्द्र सोममव नो मृधो जहि.. (२) हे पवमान सोम! हमें संग्राम की ओर भेजो. तुम देवों में दक्ष, प्रिय एवं मदकारक हो. हम तुम्हारी स्तुति के इच्छुक हैं. तुम हमारे शत्रुओं को मारो एवं हमारे पास आओ. हे इंद्र! तुम सोमरस पिओ और हमारे शत्रुओं को मारो. (२) अदब्ध इन्दो पवसे मदिन्तम आत्मेन्द्रस्य भवसि धासिरुत्तमः. अभि स्वरन्ति बहवो मनीषिणो राजानमस्य भुवनस्य निसंते.. (३) हे अहिंसित एवं अत्यंत नशीले सोम! तुम शुद्ध होते हो. तुम स्वयं ही उत्तम होकर इंद्र के भक्ष्य बनते हो. बहुत से स्तोता इस संसार के राजा सोम की स्तुति करते हैं एवं उसके समीप जाते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सहस्रणीथः शतधारो अद्भुत इन्द्रायेन्दुः पवते काम्यं मधु. जयन्क्षेत्रमभ्यर्षा जयन्नप उरुं नो गातुं कृणु सोम मीढ्वः.. (४) अनेक प्रकार की आंखों वाले, असीमित धाराओं से युक्त एवं अद्भुत सोम इंद्र के लिए मनचाहा मधुर रस टपकाते हैं. हे सोम! तुम हमारे लिए खेत और जल को जीतकर दशापवित्र की ओर आओ एवं जल बरसाने वाले बनकर हमारा मार्ग चौड़ा करो. (४) कनिक्रदत्कलशे गोभिरज्यसे व्य१व्ययं समया वारमर्षसि. मर्मृज्यमानो अत्यो न सानसिरिन्द्रस्य सोम जठरे समक्षरः.. (५) हे शब्द करते हुए एवं द्रोणकलश में स्थित सोम! तुम गायों के दूध-दही में मिलाए जाते हो एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र के पास जाते हो. मसले जाते हुए तुम घोड़े के समान सेवा करने योग्य हो. तुम इंद्र के पेट में टपको. (५) स्वादुः पवस्व दिव्याय जन्मने स्वादुरिन्द्राय सुहवीतुनाम्ने. स्वादुर्मित्राय वरुणाय वायवे बृहस्पतये मधुमाँ अदाभ्यः.. (६) हे स्वादयुक्त सोम! तुम दिव्य जन्म वाले देवों एवं शोभन नाम वाले इंद्र के लिए रस टपकाओ. तुम मधुर रस वाले एवं दूसरों द्वारा अपराजेय हो. तुम मित्र, वरुण, वायु और बृहस्पति के लिए रस बरसाओ. (६) अत्यं मृजन्ति कलशे दश क्षिपः प्र विप्राणां मतयो वाच ईरते. पवमाना अभ्यर्षन्ति सुष्टुतिमेन्द्रं विशन्ति मदिरास इन्दवः.. (७) अध्वर्यु लोगों की दस उंगलियां घोड़े के समान गतिशील सोम को कलश में मसलती हैं. ब्राह्मणों के बीच बैठे स्तोता स्तुतियां बोलते हैं. शुद्ध होते हुए सोम जाते हैं. नशीले सोम इंद्र के उदर में प्रवेश करते हैं. (७) पवमानो अभ्यर्षा सुवीर्यमुर्वी गव्यूतिं महि शर्म सप्रथः. माकिर्नो अस्य परिभूतिरीशतेन्दो जयेम त्वया धनंधनम्.. (८) हे सोम! तुम शुद्ध होते हुए हमें शोभन शक्ति, दो कोस धरती और विशाल घर दो. तुम हमारे यज्ञकर्म से द्वेष करने वालों को हमारा स्वामी मत बनाओ. हम तुम्हारी कृपा से बहुत धन जीतें. (८) अधि द्यामस्थाद्वृषभो विचक्षणोऽरूरुचद्दिवो रोचना कविः. राजा पवित्रमत्येति रोरुवद्दिवः पीयूषं दुहते नृचक्षसः.. (९) बरसने वाले एवं विशेषद्रष्टा सोम द्युलोक में स्थित थे. सोम ने द्युलोक में तारों को चमकाया. कवि एवं राजा सोम दशापवित्र को लांघकर जाते हैं. मनुष्यों को देखने वाले सोम ebook converter DEMO Watermarks*
शब्द करते हुए स्वर्ग के अमृत को दुहते हैं. (९) दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतो वेना दुहन्त्युक्षणं गिरिष्ठाम्. अप्सु द्रप्सं वावृधानं समुद्र आ सिन्धोरूर्मौ मधुमन्तं पवित्र आ.. (१०) मधुर वचन बोलने वाले वेनगोत्रीय ऋषि यज्ञ के हविर्धान नामक स्थान में अलग-अलग सोमरस निचोड़ते हैं एवं ऊंचे स्थान में स्थित जल बरसाने वाले, जल में बढ़ने वाले एवं रसरूप सोम को सागर के समान विशाल द्रोणकलश में जल की लहरों से सींचते हैं. वे मीठे रस वाले सोम को दशापवित्र में निचोड़ते हैं. (१०) नाके सुपर्णमुपपत्तिवांसं गिरो वेनानामकृपन्त पूर्वीः. शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्ततं हिरण्ययं शकुनं क्षामणि स्थाम्.. (११) द्युलोक में उत्पन्न, शोभन पत्तों वाले एवं गिरने वाले सोम की प्रशंसा हमारी स्तुतियां करती हैं. रोते हुए शिशु के समान शुद्ध करने योग्य, स्वर्णमय, पंखों से युक्त एवं धरती पर स्थित सोम को हमारी स्तुतियां प्राप्त करती हैं. (११) ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थाद्विश्वा रूपा प्रतिचक्षाणो अस्य. भानुः शुक्रेण शोचिषा व्यद्यौत्प्रारूरुचद्रोदसी मातरा शुचिः.. (१२) उन्नत एवं किरणें धारण करने वाले सोम आदित्य के मध्य स्थित होते हैं एवं इस आदित्य के सभी रूपों को देखते हैं. सूर्य में स्थित सोम दीप्त तेज के द्वारा प्रकाशित होते हैं. दीप्ति वाले सूर्य विश्व का निर्माण करने वाली द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करते हैं. (१२) सूक्त—८६ देवता—पवमान सोम प्र त आशवः पवमान धीजवो मदा अर्षन्ति रघुजा इव त्मना. दिव्याः सुपर्णा मधुमन्त इन्दवो मदिन्तमासः परि कोशमासते.. (१) हे पवमान सोम! तुम्हारे व्यापक, मन के समान तेज चाल वाले तथा नशीले रस, तेज चलने वाली घोड़ियों के बछड़ों के समान स्वयं ही चलते हैं. स्वर्ग में उत्पन्न, शोभन पत्तों वाले, मधुरतायुक्त एवं अत्यंत नशीले रस द्रोणकलश में जाते हैं. (१) प्र ते मदासो मदिरास आशवोऽसृक्षत रथ्यासो यथा पृथक्. धेनुर्न वत्सं पयसाभि वज्रिणमिन्द्रमिन्दवो मधुमन्त ऊर्मयः.. (२) हे सोम! मदकारक, व्याप्त एवं घोड़े के समान तेज चलने वाले रस अलग-अलग बनाए जाते हैं. वे मधुर व अधिक रस वाले सोम वज्रधारी इंद्र के पास उसी प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार दुधारू गाय बछड़े के पास जाती है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अत्यो न हियानो अभि वाजमर्ष स्वर्विस्कोशं दिवो अद्रिमातरम्. वृषा पवित्रे अधि सानो अव्यये सोमः पुनान इन्द्रियाय धायसे.. (३) हे सोम! तुम प्रेरित अश्व के समान संग्राम में जाओ. हे सब जानने वाले सोम! तुम द्युलोक से जल के निर्माता द्रोणकलश के पास जाओ. वर्षा करने वाले सोम के धारणकर्त्ता इंद्र के लिए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर शुद्ध होते हैं. दशापवित्र पर्वत की चोटी के समान ऊंचा है. (३) प्र त आश्विनीः पवमान धीजुवो दिव्या असृग्रन्पयसा धरीमणि. प्रान्तर्ऋषयः स्थाविरीरसृक्षत ये त्वा मृजन्त्यृषिषाण वेधसः.. (४) हे पवमान सोम! तुम्हारी फैलने वाली, मन के समान वेग वाली, दिव्य एवं दूध से युक्त धाराएं द्रोणकलश में गिरती हैं. हे ऋषियों द्वारा सेवित सोम! तुम्हारा निर्माण करने वाले ऋषि तुम्हारी धाराएं द्रोणकलश के मध्य में कर देते हैं. (४) विश्वा धामानि विश्वचक्ष ऋभ्वसः प्रभोस्ते सतः परि यन्ति केतवः. व्यानशिः पवसे सोम धर्मभिः पतिर्विश्वस्य भुवनस्य राजसि.. (५) हे सबको देखने वाले प्रभु सोम! तुम्हारी विस्तृत किरणें सभी तेजों को प्रकाशित करती हैं. हे व्यापक सोम! तुम रस-धाराओं के रूप में निचुड़ते हो एवं सकल भुवन के स्वामी के रूप में सुशोभित होते हो. (५) उभयतः पवमानस्य रश्मयो ध्रुवस्य सतः परि यन्ति केतवः. यदी पवित्रे अधि मृज्यते हरिः सत्ता नि योना कलशेषु सीदति.. (६) शुद्ध होते हुए, निश्चल एवं वर्तमान सोम का ज्ञान कराने वाली किरणें इधर-उधर चलती हैं. हरे रंग वाले एवं स्थित रहने वाले सोम जब दशापवित्र पर छाने जाते हैं, तब द्रोणकलश में रुकते हैं. (६) यज्ञस्य केतुः पवते स्वध्वरः सोमो देवानामुप याति निष्कृतम्. सहस्रधारः परि कोशमर्षति वृषा पवित्रमत्येति रोरुवत्.. (७) यज्ञ का ज्ञान कराने वाले एवं शोभन यज्ञ वाले सोम निचोड़े जाते हैं. वे सोम देवों के विशुद्ध स्थान को जाते हैं, हजार धाराओं वाले बनकर द्रोणकलश में पहुंचते हैं एवं सींचने वाले सोम शब्द करते हुए दशापवित्र को पार करके नीचे जाते हैं. (७) राजा समुद्रं नद्यो३ वि गाहतेऽपामूर्मिं सचते सिन्धुषु श्रितः. अध्यस्थात्सानु पवमानो अव्ययं नाभा पृथिव्या धरुणो महो दिवः.. (८) राजा सोम अंतरिक्ष एवं वहां स्थित जल में मिलते हैं तथा जल नीचे बरसाते हैं. जल में ebook converter DEMO Watermarks*
स्थित सोम पुकारे जाने पर दशापवित्ररूपी ऊंचे स्थान पर स्थित होते हैं जो धरती पर नाभि हैं. सोम महान् द्युलोक को धारण करने वाले हैं. (८) दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदद् द्यौश्च यस्य पृथिवी च धर्मभिः. इन्द्रस्य सख्यं पवते विवेविदत्सोमः पुनानः कलशेषु सीदति.. (९) सोम द्युलोक के ऊंचे स्थान को शब्दपूर्ण करते हुए चिल्लाते हैं एवं अपनी शक्ति से द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. सोम इंद्र की मित्रता को जानते हुए छनते हैं एवं द्रोणकलशों में स्थित होते हैं. (९) ज्योतिर्यज्ञस्य पवते मधु प्रियं पिता देवानां जनिता विभूवसुः. दधाति रत्नं स्वधयोरपीच्यं मदिन्तमो मत्सर इन्द्रियो रसः.. (१०) यज्ञ के प्रकाशक सोम देवों के प्रिय मीठे रस को टपकाते हैं. देवों के पालक, सबको उत्पन्न करने वाले एवं अधिक धन वाले सोम द्यावा-पृथिवी का रमणीय धन स्तोताओं को देते हैं. अत्यंत नशीले सोम इंद्र को बढ़ाने वाले एवं रसपूर्ण हैं. (१०) अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यर्षति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः. हरिर्मित्रस्य सदनेषु सीदति मर्मृजानोऽविभिः सिन्धुभिर्वृषा.. (११) गतिशील, द्युलोक के स्वामी, सौ धाराओं वाले, विशेष द्रष्टा व हरितवर्ण सोम देवों के मित्र के समान यज्ञ में शब्द करते हुए द्रोणकलश में स्थित होते हैं. सोम छानने के साधन दशापवित्र की सहायता से शुद्ध किए गए एवं वर्षाकारक हैं. (११) अग्रे सिन्धूनां पवमानो अर्षत्यग्रे वाचो अग्रियो गोषु गच्छति. अग्रे वाजस्य भजते महाधनं स्वायुधः सोतृभिः पूयते वृषा.. (१२) पवमान एवं उत्तम सोम जलों, माध्यमिका वाणी एवं किरणों के आगे जाते हैं. शोभन आयुधों वाले एवं वर्षक सोम अन्न पाने के लिए संग्राम करते हैं एवं ऋत्विजों द्वारा निचोड़े जाते हैं. (१२) अयं मतवाञ्छकुनो यथा हितोऽव्ये ससार पवमान ऊर्मिणा. तव क्रत्वा रोदसी अन्तरा कवे शुचिर्धिया पवते सोम इन्द्र ते.. (१३) स्तोत्रयुक्त, शोधित होते हुए एवं प्रेरित सोमरस के साथ पक्षी के समान दशापवित्र की ओर जाते हैं. हे मेधावी इंद्र! शुद्ध सोम तुम्हारे यज्ञकर्म के कारण ही द्यावा-पृथिवी के मध्य निचोड़े जाते हैं. (१३) द्रापिं वसानो यजतो दिविस्पृशमन्तरिक्षप्रा भुवनेष्वर्पितः. स्वर्जञानो नभसाभ्यक्रमीत्प्रत्नमस्य पितरमा विवासति.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*