भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1494, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1494

स्थित सोम पुकारे जाने पर दशापवित्ररूपी ऊंचे स्थान पर स्थित होते हैं जो धरती पर नाभि हैं. सोम महान् द्युलोक को धारण करने वाले हैं. (८) दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदद् द्यौश्च यस्य पृथिवी च धर्मभिः. इन्द्रस्य सख्यं पवते विवेविदत्सोमः पुनानः कलशेषु सीदति.. (९) सोम द्युलोक के ऊंचे स्थान को शब्दपूर्ण करते हुए चिल्लाते हैं एवं अपनी शक्ति से द्यावा-पृथिवी को धारण करते हैं. सोम इंद्र की मित्रता को जानते हुए छनते हैं एवं द्रोणकलशों में स्थित होते हैं. (९) ज्योतिर्यज्ञस्य पवते मधु प्रियं पिता देवानां जनिता विभूवसुः. दधाति रत्नं स्वधयोरपीच्यं मदिन्तमो मत्सर इन्द्रियो रसः.. (१०) यज्ञ के प्रकाशक सोम देवों के प्रिय मीठे रस को टपकाते हैं. देवों के पालक, सबको उत्पन्न करने वाले एवं अधिक धन वाले सोम द्यावा-पृथिवी का रमणीय धन स्तोताओं को देते हैं. अत्यंत नशीले सोम इंद्र को बढ़ाने वाले एवं रसपूर्ण हैं. (१०) अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यर्षति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः. हरिर्मित्रस्य सदनेषु सीदति मर्मृजानोऽविभिः सिन्धुभिर्वृषा.. (११) गतिशील, द्युलोक के स्वामी, सौ धाराओं वाले, विशेष द्रष्टा व हरितवर्ण सोम देवों के मित्र के समान यज्ञ में शब्द करते हुए द्रोणकलश में स्थित होते हैं. सोम छानने के साधन दशापवित्र की सहायता से शुद्ध किए गए एवं वर्षाकारक हैं. (११) अग्रे सिन्धूनां पवमानो अर्षत्यग्रे वाचो अग्रियो गोषु गच्छति. अग्रे वाजस्य भजते महाधनं स्वायुधः सोतृभिः पूयते वृषा.. (१२) पवमान एवं उत्तम सोम जलों, माध्यमिका वाणी एवं किरणों के आगे जाते हैं. शोभन आयुधों वाले एवं वर्षक सोम अन्न पाने के लिए संग्राम करते हैं एवं ऋत्विजों द्वारा निचोड़े जाते हैं. (१२) अयं मतवाञ्छकुनो यथा हितोऽव्ये ससार पवमान ऊर्मिणा. तव क्रत्वा रोदसी अन्तरा कवे शुचिर्धिया पवते सोम इन्द्र ते.. (१३) स्तोत्रयुक्त, शोधित होते हुए एवं प्रेरित सोमरस के साथ पक्षी के समान दशापवित्र की ओर जाते हैं. हे मेधावी इंद्र! शुद्ध सोम तुम्हारे यज्ञकर्म के कारण ही द्यावा-पृथिवी के मध्य निचोड़े जाते हैं. (१३) द्रापिं वसानो यजतो दिविस्पृशमन्तरिक्षप्रा भुवनेष्वर्पितः. स्वर्जञानो नभसाभ्यक्रमीत्प्रत्नमस्य पितरमा विवासति.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

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