ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1479, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशोभन गति वाले, नेता एवं देखने में सुंदर मरुद्गण माध्यमिका वाणी की स्तुति करने वालों के वश में हो जाते हैं। (७) ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतुस्त्री ष पवित्रा हृद्य१न्तरा दधे. विद्वान्तस विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान्विध्यति कर्ते अव्रतान्.. (८) यज्ञ के रक्षक एवं शोभन कर्म वाले सोम को कोई रोकता नहीं. सोम अपने हृदय में तीन पवित्रों—अग्नि, वायु एवं सूर्य को धारण करते हैं. सब कुछ जानने वाले सोम सब लोकों को देखते हैं एवं यज्ञकर्म न करने वाले अप्रिय लोगों को नीचे की ओर मुंह करके पीड़ित करते हैं. (८) ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया. धीराश्चित्तत्समिनक्षन्त आशतात्रा कर्तमव पदात्यप्रभुः.. (९) सत्यरूप यज्ञ का विस्तार करने वाले, दशापवित्र में फैले सोम वरुण की जीभ के अग्रभाग के समान जल में रहते हैं. यज्ञकर्म करने वाले उन सोम को पाते हैं. जो यज्ञकर्म करने में असमर्थ हैं, वे नरक में जाते हैं. (९) सूक्त—७४ देवता—पवमान सोम शिशुर्न जातोऽव चक्रदद्धने स्व१र्यद्द्वाज्यरुषः सिषासति. दिवो रेतसा सचते पयोवृधा तमीमहे सुमती शर्म सप्रथः.. (१) जल में उत्पन्न पवमान सोम नीचे की ओर मुंह करके बालक के समान रोते हैं. शक्तिशाली घोड़े के समान चलने वाले सोम स्वर्गलोक का सहारा लेना चाहते हैं. वे गायों एवं ओषधियों के रस के साथ स्वर्ग से धरती पर आते हैं. हम शोभन स्तुतियों के द्वारा उन सोम से धनसंपन्न घर मांगते हैं. (१) दिवो यः स्कम्भो धरुणः स्वातत आपूर्णो अंशुः पर्यैति विश्वतः. सेमे मही रोदसी यक्षदावृता समीचीने दाधार समिषः कविः.. (२) स्वर्गलोक को स्तंभित करने वाले, धरती के धारणकर्त्ता, सब जगह विस्तृत एवं पात्रों में भरे हुए सोम की किरणें चारों ओर जाती हैं. सोम ने विस्तृत द्यावा-पृथिवी को धारण किया था. यज्ञकर्म करने वाले सोम स्तोताओं को अन्न दें. (२) महि प्सरः सुकृतं सोम्यं मध्वीं गव्यूतिरदितेर्ऋतं यते. इशे यो वृष्टेरित उसियो वृषापां नेता य इतऊतिर्ऋग्मियः.. (३) यज्ञ में जाने वाले इंद्र के लिए भली-भांति संस्कृत एवं सोम मिला हुआ मधुर रस पीने ebook converter DEMO Watermarks*