भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1498, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1498

शब्द करने वाले सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करते हैं. वर्षा करने वाले एवं हरे रंग के सोम जल में क्रंदन करते हैं. ध्यान करने वाली एवं सोम की कामना करने वाली स्तुतियां शिशु के समान संस्कारयोग्य एवं शब्द करते हुए सोम को अपना विषय बनाती हैं. (३१) स सूर्यस्य रश्मिभिः परि व्यत तन्तुं तन्वानस्त्रिवृतं यथा विदे. नयन्नृतस्य प्रशिषो नवीयसीः पतिर्जनीनामप याति निष्कृतम्.. (३२) सोम तीनों सवनों के द्वारा यज्ञ का विस्तार करते हुए अपने-आपको सूर्यकिरणों से घेरते हैं एवं यज्ञ को जानते हैं. प्रजाओं के पालक सोम यजमान की नवीन स्तुतियों को प्राप्त करते हुए शुद्ध पात्र में जाते हैं. (३२) राजा सिन्धूनां पवते पतिर्दिव ऋतस्य याति पथिभिः कनिक्रदत्. सहस्रधारः परि षिच्यते हरिः पुनानो वाचं जनयन्नुपावसुः.. (३३) नदियों के ईश्वर एवं स्वर्ग के स्वामी सोम शुद्ध किए जाते हैं एवं शब्द करते हुए यज्ञ के मार्ग से जाते हैं. असीम धाराओं वाले सोम ऋत्विजों द्वारा पात्रों में भरे जाते हैं. सोम हरे रंग वाले, शब्द करते हुए, शुद्ध होने वाले एवं समीप जाने वाले हैं. (३३) पवमान मह्यर्णो वि धावसि सूरो न चित्रो अव्ययानि पव्यया. गभस्तिपूतो नृभिरद्रिभिः सुतो महे वाजाय धन्याय धन्वसि.. (३४) हे पवमान सोम! तुम अधिक रस देते हो. हे सूर्य के समान पूज्य सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हो. हे बहुतों द्वारा पवित्र एवं ऋत्विजों द्वारा पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोम! तुम महान् युद्धों में धनप्राप्ति के लिए जाते हो. (३४) इषमूर्जं पवमानाभ्यर्षसि श्येनो न वंसु कलशेषु सीदसि. इन्द्राय मद्धा मद्यो मदः सुतो दिवो विष्टम्भ उपमो विचक्षणः.. (३५) हे पवमान सोम! तुम अन्न और बल को प्राप्त करते हो. बाज जिस प्रकार अपने घोंसले में जाता है, उसी प्रकार तुम कलशों में स्थित होते हो. हे सोम! तुम स्वर्ग के समान, स्वर्ग को साधने वाले एवं विशेष द्रष्टा हो. तुम्हारा नशीला रस इंद्र के लिए निचोड़ा गया है. (३५) सप्त स्वसारो अभि मातरः शिशुं नवं जज्ञानं जेन्यं विपश्चितम्. अपां गन्धर्वं दिव्यं नृचक्षसं सोमं विश्वस्य भुवनस्य राजसे.. (३६) माता जिस प्रकार बालक के पास जाती है, उसी प्रकार सात नदियां नवीन उत्पन्न, जीतने वाले, विद्वान्, जलों को जन्म देने वाले, जलधारणकर्त्ता, स्वर्ग में उत्पन्न एवं मानवों को देखने वाले सोम के पास जाती हैं. (३६) ebook converter DEMO Watermarks*