भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पराजित करें. तुम शुद्ध होते हुए हमारे लिए द्यावा-पृथिवी को शोभन निवास वाली बनाओ. (२७) अश्वो न क्रदो वृषभिर्युजानः सिंहो न भीमो मनसो जवीयान्. अर्वाचीनैः पथिभिर्ये रजिष्ठा आ पवस्व सैमनसं न इन्दो.. (२८) हे ऋत्विजों द्वारा मिलाए जाते हुए, सिंह के समान भयंकर व मन से भी अधिक तेज चलने वाले सोम! तुम घोड़े के समान शब्द करते हो. तुम अत्यंत सरल मार्गों द्वारा हमें मन की प्रसन्नता दो. (२८) शतं धारा देवजाता असृग्रन्तसहस्रमेनाः कवयो मृजन्ति. इन्दो सनित्रं दिव आ पवस्व पुरएतासि महतो धनस्य.. (२९) हे सोम! देवों के लिए उत्पन्न तुम्हारी हजारों धाराएं बनाई जा रही हैं. बुद्धिमान् लोग तुम्हारी हजारों धाराओं को शुद्ध करते हैं. हमारी संतान के लिए स्वर्ग से भोग का साधन धन प्रदान करो. तुम महान् धन के आगे चलते हो. (२९) दिवो न सर्गा अससृग्रमह्नां राजा न मित्रं प्र मिनाति धीरः. पितुर्न पुत्रः क्रतुभिर्यतान आ पवस्व विशे अस्या अजीतिम्.. (३०) जिस प्रकार सूर्य की दिननिर्मात्री किरणें बनाई जाती हैं, उसी प्रकार राजा, मित्र एवं वीर सोम की लहरों का निर्माण होता है. जिस प्रकार यज्ञकर्मों के द्वारा प्रयत्न करने वाला पुत्र पिता को पराजित नहीं करता, उसी प्रकार तुम इस प्रजा को कभी पराजित मत करो. (३०) प्र ते धारा मधुमतीरसृग्रन्वारान्यत्पूतो अत्येष्यव्यान. पवमान पवसे धाम गोनां जज्ञानः सूर्यमपिन्वो अर्कैः.. (३१) हे सोम! जब तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके जाते हो, तब तुम्हारी मधु वाली धाराएं बनती हैं. हे शुद्ध होते हुए एवं धारक सोम! तुम गाय के दूध की ओर छनते हो और उत्पन्न होते हुए अपने तेज से आदित्य को पूर्ण करते हो. (३१) कनिक्रददनु पन्थामृतस्य शुक्रो वि भास्यमृतस्य धाम. स इन्द्राय पवसे मत्सरवान्हिन्वानो वाचं मतिभिः कवीनाम्.. (३२) निचुड़ते हुए सोम यज्ञ के मार्ग पर बार-बार शब्द करते हैं. हे अमृत के स्थान एवं शुक्लवर्ण सोम! तुम विशेषरूप से चमकते हो. हे स्तोताओं की बुद्धि के साथ शब्द भेजने वाले एवं मदकारक सोम! तुम इंद्र के लिए छनते हो. (३२) दिव्यः सुपर्णोऽव चक्षि सोम पिन्वन्धाराः कर्मणा देववीतौ. एन्दो विश कलशं सोमधानं क्रन्दन्निहि सूर्यस्योप रश्मिम्.. (३३) ebook converter DEMO Watermarks*