ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1522, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे दिव्य एवं शोभन पतन वाले सोम! तुम यज्ञ कर्म के द्वारा अपनी धाराएं गिराते हुए नीचे की ओर देखो एवं द्रोणकलश की ओर जाओ. तुम शब्द करते हुए सूर्य की कांति प्राप्त करो. (३३) तिस्रो वाच ईरयति प्र वह्निर्ऋतस्य धीतिं ब्रह्मणो मनीषाम्. गावो यन्ति गोपतिं पृच्छमानाः सोमं यन्ति मतयो वावशानाः.. (३४) यजमान तीनों वेदों से संबंधित स्तुतियां बोलता है तथा सोम को यज्ञ को धारण करने वाली एवं कल्याणकारक स्तुतियों की प्रेरणा देता है. गाएं जिस प्रकार सांड की ओर जाती हैं, उसी प्रकार गाएं अपने दूध से सोम को मिश्रित करने के लिए जाती हैं. अभिलाषा करते हुए स्तोता सोम के पास जाते हैं. (३४) सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः. सोमः सुतः पूयते अज्यमानः सोमे अर्कास्त्रिष्टुभः सं नवन्ते.. (३५) प्रसन्न करने वाली गाएं सोम की कामना करती हैं. मेधावी स्तोता अपनी स्तुतियों द्वारा सोम को पूछते हैं. गायों के दूध से मिले हुए एवं निचुड़े हुए सोम ऋत्विजों द्वारा शुद्ध किए जाते हैं. त्रिष्टुप् छंद में बोले गए मंत्र सोम के पास जाते हैं. (३५) एवा नः सोम परिषिच्यमान आ पवस्व पूयमानः स्वस्ति. इन्द्रमा विश बृहता रवेण वर्धया वाचं जनया पुरंधिम्.. (३६) हे सोम! तुम पात्रों में निचुड़ते हुए एवं छनते हुए हमें कल्याण प्राप्त कराओ, महान् शब्द करते हुए इंद्र के उदर में प्रवेश करो, हमारे स्तुतिवचन को बढ़ाओ एवं हमारा ज्ञान बढ़ाओ. (३६) आ जागृविर्विप्र ऋता मतीनां सोमः पुनानो असदच्चमूषु. सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः.. (३७) जागरणशील, सच्ची स्तुतियों के ज्ञाता एवं शुद्ध होते हुए सोम चमू नामक पात्रों में बैठते हैं. आपस में मिले हुए, अत्यंत अभिलाषी, यज्ञ के नेता एवं हाथ में कल्याण रखने वाले पुरोहित तथा अध्वर्यु दशापवित्र में सोम को छूते हैं. (३७) स पुनान उप सूरे न धातोभे अप्रा रोदसी वि ष आवः. प्रिया चिद्यस्य प्रियसास ऊती स तू धनं कारिणे न प्र यंसत्.. (३८) जिस प्रकार संवत्सर सूर्य के पास जाता है, उसी प्रकार शुद्ध होते हुए सोम इंद्र के पास जाते हैं एवं द्यावा-पृथिवी दोनों को अपनी महिमा से पूर्ण करते हैं. सोम अपने तेज से अंधकारों का नाश करते हैं. जिस प्यारे सोम की अत्यंत प्रिय धाराएं रक्षा करती हैं, वह हमें इस प्रकार धन दें, जिस प्रकार सेवक को वेतन मिलता है. (३८) ebook converter DEMO Watermarks*