भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1523, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1523

स वर्धिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढवाँ अभि नो ज्योतिषावीत्. येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञाः स्वर्विदो अभि गा अद्रिमुष्णन्.. (३९) देवों को बढ़ाने वाले, स्वयं बढ़ने वाले, दशापवित्र द्वारा शुद्ध व अभिलाषापूरक सोम अपने तेज से हमारी रक्षा करें. पणियों द्वारा चुराई हुई गायों के पदचिह्न जानने वाले एवं सूर्य के ज्ञाता हमारे पितर सोमपान के द्वारा अंधकारपूर्ण गुफाओं में जाकर पशुओं को ले आए थे. (३९) अक्रान्तसमुद्रः प्रथमे विधर्मञ्जनयन्प्रजा भुवनस्य राजा. वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे सुवान इन्दुः.. (४०) जल बरसाने वाले एवं राजा सोम विस्तृत एवं जलधारक अंतरिक्ष में प्रजाओं को उत्पन्न करते हुए सबसे आगे निकल जाते हैं. अभिलाषापूरक, निचुड़ते हुए एवं दीप्त सोम भेड़ के बालों से बने ऊंचे दशापवित्र पर बहुत बढ़ते हैं. (४०) महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भोऽवृणीत देवान्. अदधादिन्द्रे पवमान ओजोऽजनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्दुः.. (४१) महान् सोम ने बहुत से काम किए हैं. जल के गर्भरूप सोम ने देवों का सहारा लिया है. पवमान सोम ने इंद्र को ओज दिया है एवं सूर्य में तेज उत्पन्न किया है. (४१) मत्सि वायुमिष्टये राधसे च मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः. मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम.. (४२) हे सोम! हमें अन्न और धन देने के लिए तुम वायु को प्रमुदित करो. तुम पवित्र होते हुए मित्रावरुण को प्रसन्न करो तथा मरुतों के बल एवं देवों को प्रमत्त करो. हे स्तुतियोग्य सोम! तुम द्यावा-पृथिवी को नशे में कर दो. (४२) ऋजुः पवस्व वृजिनस्य हन्तापामीवां बाधमानो मृधश्च. अभिश्रीणन्पयः पयसाभि गोनामिन्द्रस्य त्वं तव वयं सखायः.. (४३) हे सरल गति वाले, उपद्रव नष्ट करने वाले, रोगरूपी राक्षस को बाधा पहुंचाने वाले एवं हमारे हिंसक शत्रुओं को समाप्त करने वाले सोम! तुम टपको. तुम अपने रस को गायों के दूध में मिलाते हुए हमारे और इंद्र के मित्र बनो. (४३) मध्वः सूदं पवस्व वस्व उत्सं वीरं च न आ पवस्वा भगं च. स्वदस्वेन्द्राय पवमान इन्दो रयिं च न आ पवस्वा समुद्रात्.. (४४) हे सोम! तुम मधुरता बरसाने वाले और धन के वर्षक अपने रस को टपकाओ तथा हमें वीरपुत्र एवं भोगयोग्य अन्न दो. हे सोम! तुम शुद्ध होते हुए इंद्र के लिए रुचिकर बनो तथा हमें ebook converter DEMO Watermarks*

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