ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1526, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंएष विश्ववित्पवते मनीषी सोमो विश्वस्य भुवनस्य राजा. द्रप्साँ ईरयन्विद्धेष्विन्दुविं वारमव्यं समयाति याति.. (५६) सबको जानने वाले, मेधावी व सकल भुवन के स्वामी सोम टपकते हैं. सोम यज्ञों में अपना रस प्रेरित करते हुए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र के पास दोनों ओर से जाते हैं. (५६) इन्दुं रिहन्ति महिषा अदब्धाः पदे रेभन्ति कवयो न गृध्राः. हिन्वन्ति धीरा दशभिः क्षिपाभिः समञ्जते रूपमपां रसेन.. (५७) महान् एवं अहिंसित देव सोम का आस्वादन करते हैं. सोम से धन की अभिलाषा करने वाले स्तोता जिस प्रकार शब्द करते हैं, उसी प्रकार सोम का स्वाद लेने वाले देव उनकी धारा के समीप शब्द करते हैं. कुशल ऋत्विज् दस उंगलियों के द्वारा सोम को मसलते हैं एवं जल के साथ सोम का रस मिलाते हैं. (५७) त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत्. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (५८) हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम्हारी सहायता से हम युद्ध में अनेक विशिष्ट काम करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और स्वर्गलोक धन द्वारा हमारा आदर करें. (५८) सूक्त—९८ देवता—पवमान सोम अभि नो वाजसातमं रयिमर्ष पुरुस्पृहम्. इन्दो सहस्रभरणसं तुविद्युम्नं विष्वासहम्.. (१) हे दीप्त सोम! हमें पर्याप्त अन्न देने वाला, बहुतों द्वारा अभिलषित, अनेक प्रकार से भरणपोषण करने वाला एवं बड़ों को हराने वाला पुत्र दो. (१) परि ष्य सुवानो अव्ययं रथे न वर्माव्यत. इन्दुरभि द्रुणा हितो हियानो धाराभिरक्षाः.. (२) निचुड़ते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर ऐसे स्थित होते हैं, जैसे रथ में बैठा हुआ पुरुष कवच धारण करता है. स्तोताओं द्वारा प्रशंसित सोम द्रोणकलश में भरते हुए धाराओं के रूप में गिरते हैं. (२) परि ष्य सुवानो अक्षा इन्दुरुव्ये मदच्युतः. धारा य ऊर्ध्वो अध्वरे भ्राजा नैति गव्ययुः.. (३) निचोड़े जाते हुए सोम देवों के द्वारा नशे के लिए प्रेरित होकर भेड़ के बालों से बने