ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1541, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुद्ध होते हुए दीप्तिशाली, अत्यंत सत्य रूप एवं राजा सोम द्रोणकलश में धारा के रूप में गिरते हैं. प्रेरित एवं अत्यंत सत्य सोम मित्र और वरुण की रक्षा के लिए बहते हैं. (१५) नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो राजा देवः समुद्रियः.. (१६) ऋत्विजों द्वारा नियमित, अभिलाषा करने योग्य, विशेष द्रष्टा, दीप्तिशाली एवं राजा सोम अंतरिक्ष में उत्पन्न होकर इंद्र के लिए टपकते हैं. (१६) इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः. सहस्रधारो अत्यव्यमर्षति तमी मृजन्त्यायवः.. (१७) नशीले एवं निचुड़े हुए सोम मरुतों सहित इंद्र के लिए छनते हैं. हजार धाराओं वाले सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करते हैं. (१७) पुनानश्चमूर् जनयन्मतिं कविः सोमो देवेषु रण्यति. अपो वसानः परि गोभिरुत्तरः सीदन्वनेष्वव्यत.. (१८) चमू नामक पात्रों में निचोड़े जाते हुए, स्तुति उत्पन्न करते हुए एवं मेधावी सोम देवों के समीप जाते हैं. जलों को ढकते हुए एवं काठ से बने द्रोण कलश में बैठे हुए सोम गाय के दूध-दही द्वारा ढके जाते हैं. (१८) तवाहं सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे. पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधीँरति ताँ इहि.. (१९) हे दीप्तिशाली सोम! मैं तुम्हारी मित्रता में प्रतिदिन प्रसन्न रहता हूं. हे पीले रंग वाले सोम! तुम्हारे मित्र को बहुत से राक्षस बाधा पहुंचाते हैं. तुम उन्हें मारो. (१९) उताहं नक्तमुत सोम ते दिवा सख्याय बभ्र ऊधनि. घृणा तपन्तमति सूर्यं परः शकुना इव पत्तिम.. (२०) हे पीले रंग वाले सोम! मैं रात-दिन तुम्हारी मित्रता में आनंदित रहता हूं. हम दीप्ति से प्रज्वलित एवं परम स्थान में स्थित तुम्हारे समीप उसी प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार पक्षी सूर्य का अतिक्रमण करते हैं. (२०) मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाचमिन्वसि. रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि.. (२१) हे शोभन उंगलियों वाले एवं मसले जाते हुए सोम! तुम अंतरिक्ष में अपना शब्द भेजते हो. हे पवमान सोम! तुम स्तोताओं को पीले रंग का, अधिक एवं बहुतों द्वारा चाहने योग्य धन देते हो. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*