ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिस प्रकार ग्वाला दूध दुहने के लिए गाय को बुलाता है, उसी प्रकार हम भी अपनी रक्षा के लिए सुंदर कर्म करने वाले इंद्र को प्रतिदिन बुलाते हैं. (१) उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब. गोदा इद्वेवतो मदः.. (२) हे सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए हमारे त्रिषवण यज्ञ के पास आओ. तुम धन के स्वामी हो. तुम्हारी प्रसन्नता गाय देने का कारण बनती है. (२) अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्. मा नो अति ख्य आ गहि.. (३) हे इंद्र! हम सोमपान करने के पश्चात् तुम्हारे अत्यंत समीपवर्ती एवं शोभन-बुद्धि वाले लोगों के बीच रहकर तुम्हें जानें. तुम भी हमें छोड़कर दूसरों को दर्शन मत देना. तुम हमारे समीप आओ. (३) परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्. यस्ते सखिभ्य आ वरम्.. (४) हे यजमान! बुद्धिमान् एवं हिंसारहित इंद्र के पास जाकर मुझ बुद्धिमान् होता के विषय में पूछो. वे तुम्हारे मित्रों को उत्तम धन देते हैं. (४) उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत. दधाना इन्द्र इद्दुवः.. (५) सदा इंद्र की सेवा करने वाले हमारे पुरोहित इंद्र की स्तुति करें. इंद्र की निंदा करने वाले लोग इस देश के अतिरिक्त अन्य देशों से भी निकल जावें. (५) उत नः सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः. स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि.. (६) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम्हारी कृपा से शत्रु और मित्र दोनों हमें सुंदर धन वाला कहते हैं. हम इंद्र की कृपा से प्राप्त सुख से जीवन बितावें. (६) एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्. पतयन्मन्दयत् सखम्.. (७) यह सोमरस तुरंत नशा करने वाला एवं यज्ञ की शोभा है. यह मनुष्यों को मस्त करने वाला, कार्यसाधक और आनंददाता इंद्र का मित्र है. यज्ञ में व्याप्त इंद्र को यह सोमरस दो. (७) अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः. प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (८) हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र! इसी सोमरस को पीकर तुमने वृत्र आदि शत्रुओं का नाश किया था और युद्धक्षेत्र में अपने योद्धाओं की रक्षा की थी. (८) तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो. धनानामिन्द्र सातये.. (९) eBook converter DEMO Watermarks*