भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1602, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1602

विस्तृत स्थान में रहता हूं. मैं सभी युद्धों में उस यजमान की रक्षा करता हूं जो सोमरस निचोड़कर मेरा पेट भर देता है.” (२) अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तुयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्. पचन्ति ते वृषभाँ अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन्हूयमानः.. (३) इंद्र की पुत्रवधू ने कहा— “हे इंद्र! यजमान पत्थरों की सहायता से तुम्हारे लिए सोमरस तैयार करते हैं. तुम सोमरस पीते हो. यजमान बैल का मांस पकाते हैं और तुम उसे खाते हो. उस समय तुम यजमानों द्वारा बुलाए जाते हो.” (३) इदं सु मे जरितरा चिकिद्धि प्रतीपं शापं नद्यो वहन्ति. लोपाशः सिंहं प्रत्यञ्चमत्साः क्रोष्टा वराहं निरतक्त कक्षात्.. (४) “हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम मुझ में इतनी सामर्थ्य दे दो कि मेरी इच्छामात्र से नदियों का जल उलटा बहने लगे. मेरे द्वारा भेजा हुआ सिंह अपने पर झपटने वाले सिंह को भगा दे एवं गीदड़ वन से सूअर को भगा दे.” (४) कथा त एतदहमा चिकेतं गृत्सस्य पाकस्तवसो मनीषाम्. त्वं नो विद्वाँ ऋतुथा वि वोचो यमर्धं ते मघवन्क्षेम्या धूः.. (५) “हे इंद्र! मुझ अल्पबुद्धि में इतनी शक्ति कहां है कि तुझ प्राचीन एवं बुद्धिमान् देव की स्तुति कर सकूं. हे सर्वज्ञ एवं धनस्वामी इंद्र! तुम समयसमय पर हमें बताते हो, इसलिए हम तुम्हारी स्तुति का कुछ भाग सरलता से वहन कर लेते हैं.” (५) एवा हि मां तवसं वर्धयन्ति दिवश्चिन्मे बृहत उत्तरा धूः. पुरू सहस्रा नि शिशामि साकमशत्रुं हि मा जनिता जजान.. (६) इंद्र ने कहा— “स्तोता मुझ प्राचीन इंद्र की स्तुति इन शब्दों में करते हैं कि मुझ महान् इंद्र का विस्तार द्युलोक से भी अधिक विस्तृत है. मैं एक साथ ही हजारों शत्रुओं को नष्ट कर सकता हूं. उत्पन्न करने वाले ने मुझे शत्रुरहित बनाया है.” (६) एवा हि मां तवसं जज्ञुरग्रं कर्मन्कर्मन्वृषणमिन्द्र देवाः. वधीं वृत्रं वज्रेण मन्दसानोऽप व्रजं महिना दाशुषे वम्.. (७) इंद्रपुत्र वसुक ने कहा— “हे इंद्र! देवगण मुझे तुम्हारे ही समान महान्, प्रत्येक कार्य में शूर एवं अभिलाषापूरक समझते हैं. मैंने प्रसन्नतापूर्वक वज्र के द्वारा वृत्र का वध किया था. मैंने अपनी महिमा से ही यजमान को गाय का समूह दिया था.” (७) देवास आयन्परशूँरबिभ्रन्वना वृश्चन्तो अभि विड्भिरायन्. नि सुद्र्वं१ दधतो वक्षणासु यत्रा कृपीटमनु तद्दहन्ति.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*