भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1603, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1603

“देवगण आते हैं और मेघ के वध के लिए वज्र को धारण करते हैं. वे मरुतों के साथ मेघों का भेदन करके वर्षा का जल बरसाते हैं. वे शोभन जल नदियों में धारण करते हैं. वे जहां भी जल देखते हैं, उसे वर्षा करने के लिए सोख लेते हैं.” (८) शशः क्षुरं प्रत्यञ्चं जगाराद्रिं लोगेन व्यभेदमारत्. बृहन्तं चिद्दहते रन्धयानि वयद्वत्सो वृषभं शूशुवानः.. (९) “मेरे द्वारा प्रेरित खरगोश अपने पर झपटने वाले सिंह आदि को पकड़ लेता है. मैं दूर से मिट्टी का ढेला फेंककर पर्वत को फोड़ देता हूं. मैं बड़े को छोटे के वश में कर देता हूं. मेरे कारण छोटा बछड़ा शक्तिशाली होकर सांड़ से लड़ने जाता है.” (९) सुपर्ण इत्था नखमा सिषायावरुद्धः परिपदं न सिंहः. निरुद्धश्चिन्महिषस्तर्ष्यावान्गोधा तस्मा अयथं कर्षदेतत्.. (१०) “पिंजरे में बंद सिंह जिस प्रकार चारों ओर पंजा मारता है, उसी प्रकार बाज का रूप धारण करके सोमलता लेने को गई गायत्री स्वर्गलोक में अपने नाखून रगड़ती है.” इंद्र बंधे हुए पैरों वाले भैंसे के समान प्यासे थे. गायत्री उनके लिए सोमलता ले आई. (१०) तेभ्यो गोधा अयथं कर्षदेतद्ये ब्रह्मणः प्रतिपीयन्त्यन्नैः. सिम उक्ष्णोऽवसृष्टाँ अदन्ति स्वयं बलानि तन्वः शृणानाः.. (११) जो मरुत् आदि देव इंद्र के सोमरस से तृप्त होते हैं, उनके लिए गायत्री बिना परिश्रम के ही सोमलता ले आती है. वे यज्ञों में इंद्र से बचे हुए सब सोमरस का भोग करते हैं एवं अपने आप शत्रुसेना का नाश करते हैं. (११) एते शमीभिः सुशमी अभूवन्ये हिन्विरे तन्व१: सोम उक्थैः. नृवद्वदन्नुप नो माहि वाजान्दिवि श्रवो दधिषे नाम वीरः.. (१२) जो लोग सोमयाग में स्तुतियों से अपने शरीर को बढ़ाते हैं. वे इंद्र की आज्ञा से सोम के आ जाने पर शोभन कर्म वाले बनें. हे इंद्र! तुम मनुष्यों के समान शब्दों को बोलते हुए हमारे लिए अन्न लाते हो. हे शूर इंद्र! तुम स्वर्ग में ‘दान स्वामी’ नाम धारण करते हो. (१२) सूक्त—२९ देवता—इंद्र वने न वा यो न्यधायि चाकञ्छुचिर्वां स्तोमो भुरणावजीगः. यस्येदिन्द्रः पुरुदिनेषु होता नृणां नर्यो नृतमः क्षपावान्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! पक्षी जिस प्रकार डर से चारों ओर देखता हुआ पेड़ पर बने घोंसले में अपने बच्चे रखता है, उसी प्रकार मैंने प्रयत्न करके यह स्तोत्र बनाया है. अनेक दिनों में इन ebook converter DEMO Watermarks*