भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1604, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1604

स्तोत्रों द्वारा बुलाने पर मानवहितैषी, नेता के होता एवं श्रेष्ठ याज्ञिक इंद्र यज्ञ पूरा करते हैं एवं रात में भी सोमरस ग्रहण करते हैं. (१) प्र ते अस्या उषसः प्रापरस्या नृतौ स्याम नृतमस्य नृणाम्. अनु त्रिशोकः शतमावहन्नृन्कुत्सेन रथो यो असत्ससवान्.. (२) हे नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र! हम इस एवं अन्य प्रातःकालों में तुम्हारी स्तुति करके उत्तम बनें. तुम्हारी स्तुति करके त्रिशोक ऋषि ने सौ मनुष्यों को अनुयायी के रूप में पाया था और स्तुति के कारण ही कुत्स ऋषि तुम्हारे साथ रथ पर बैठे थे. (२) कस्ते मद इन्द्र रन्त्यो भूद्भूरो गिरो अभ्यु१ग्रो वि धाव. कद्वाहो अर्वागुप मा मनीषा आ त्वा शक्यामुपमं राधो अन्नैः.. (३) हे इंद्र! कौन सा नशा तुम्हें सबसे अधिक प्रसन्न करता है? हे शक्तिशाली इंद्र! हमारे स्तुतिवचन सुनकर तुम यज्ञशाला के द्वार की ओर दौड़ो. तुम्हारी स्तुति के द्वारा मैं कब उत्तम वाहन प्राप्त करूंगा एवं कब अन्नों के साथ धन अपनी ओर खींच सकूंगा. (३) कदु द्युम्नमिन्द्र त्वावतो नून्कया धिया करसे कन्न आगन्. मित्रो न सत्य उरुगाय भृत्या अन्ने समस्य यदसन्मनीषाः.. (४) हे इंद्र! तुम कब हमारा हवि भक्षण करके एवं हमारी स्तुति सुनकर यज्ञकर्म द्वारा हमें अपने समान बनाओगे? तुम कब आओगे? हे विशाल कीर्ति वाले इंद्र! तुम सच्चे मित्र के समान अन्न द्वारा सबका भरण करते हो. तुम स्तुति करने पर सबका भरणपोषण करते हो. (४) प्रेरय सूरो अर्थं न पारं ये अस्य कामं जनिधा इव ग्मन्. गिरश्च ये ते तुविजात पूर्वीर्नर इन्द्र प्रतिशिक्षन्त्यन्नैः.. (५) हे इंद्र! पुरुष जिस प्रकार अपनी पत्नी की अभिलाषा पूर्ण करता है, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्त्ताओं की इच्छा पूरी करो, क्योंकि तुम सूर्य के समान दाता हो. हे अनेक रूपधारी इंद्र! जो यजमान हव्य के साथ प्राचीन स्तुतियां तुम्हारे लिए बोलते हैं, उन्हें संपन्न बनाओ. (५) मात्रे नु ते सुमिते इन्द्र पूर्वी द्यौर्मज्मना पृथिवी काव्येन. वराय ते घृतवन्तः सुतासः स्वाद्मन्भवन्तु पीतये मधूनि.. (६) हे इंद्र! तुम्हारे शत्रुनाशक कर्म से शीघ्र निर्मित एवं विस्तृत द्यावा-पृथिवी तुम्हारी माता के समान है. घृतयुक्त सोमरस पीकर एवं स्वादिष्ट हव्य खाकर तुम प्रसन्न बनो. (६) आ मध्वो अस्मा असिचन्नमत्रमिन्द्राय पूर्णं स हि सत्यराधाः. स वावृधे वरिमन्ना पृथिव्या अभि क्रत्वा नर्यः पौंस्यैश्च.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*