ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1605, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंइंद्र सच्चे धनदाता हैं, इसलिए पात्रों को पूरा भरकर मधुर सोमरस दो. इंद्र धरती से भी अधिक विस्तृत हैं. मानव हितकारी इंद्र अपने कार्यों और पुरुषार्थ से बढ़ते हैं. (७) व्यानळिन्द्रः पृतनाः स्वोजा आस्मै यतन्ते सख्याय पूर्वीः. आ स्मा रथं न पृतनासु तिष्ठ यं भद्रया सुमत्या चोदयासे.. (८) शोभन शक्ति वाले इंद्र ने शत्रुसेना को घेर लिया. शत्रुओं के श्रेष्ठ सैनिक इंद्र से मित्रता करने का यत्न करते हैं. हे इंद्र! तुम जिस प्रकार पूर्वकाल में बुद्धिमान् आदमी के समान युद्ध के लिए रथ पर चढ़ते रहे हो, उसी प्रकार आज भी इस यज्ञ में आने के लिए आदर के साथ अपने रथ पर बैठो. (८) सूक्त—३० देवता—जल प्र देवत्रा ब्रह्मणे गातुरेत्वपो अच्छा मनसो न प्रयुक्ति. महीं मित्रस्य वरुणस्य धासिं पृथुञ्जयसे रीरधा सुवृक्तिम्.. (१) यज्ञ के समय सोमरस देवों के निमित्त उस प्रकार शीघ्र जल की ओर जावें, जिस प्रकार मन तेज चलता है. हे अध्वर्युजनो! मित्र एवं विस्तृत गति इंद्र के लिए महान् सोम को शुद्ध करो. (१) अध्वर्यवो हविष्मन्तो हि भूताच्छाप इतोषतीरुशन्तः. अव याश्चष्टे अरुणः सुपर्णस्तमास्यध्वमूर्मिमद्य सुहस्ताः.. (२) हे हव्य धारण करने वाले अध्वर्युजनो! तुम सोम से युक्त हो जाओ. सोमरस निचोड़ने की अभिलाषा करने वाले तुम सोमरस की कामना करने वाले जलों की ओर जाओ. हे सुंदर हाथों वाले अध्वर्युजनो! यह सोम लाल रंग के पक्षी की तरह नीचे गिरता है, उसे तरंग के रूप में दशापवित्र पर डालो. (२) अध्वर्यवोऽप इता समुद्रमपां नपातं हविषा यजध्वम्. स वो दददूर्मिमद्य सुपूर्तं तस्मै सोमं मधुमन्तं सुनोत.. (३) हे अध्वर्युजनो! यहां से जलपूर्ण सागर में जाओ तथा जलों के नाती अर्थात् अग्नि देव का होम करो. वे अग्नि आज तुम्हें अत्यंत शुद्ध जल की लहरें प्रदान करें तुम उनके लिए मधुर सोमरस निचोड़ो. (३) यो अनिध्मो दीदयदप्स्व१न्तर्यं विप्रास ईळते अध्वरेषु. अपां नपान्मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्याय.. (४) जो जल के नाती अग्नि देव जलों के भीतर काष्ठों के बिना भी जलते हैं एवं ब्राह्मण ebook converter DEMO Watermarks*