भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1606, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1606

यज्ञों में जिनकी स्तुति करते हैं, वे हमें ऐसा मधुर जल दें, जिसे पीकर इंद्र वीरता के कर्म करने के लिए बढ़ें. (४) याभिः सोमो मोदते हर्षते च कल्याणीभिर्युवतिभिर्न मर्यः. ता अध्वर्यो अपो अच्छा परेहि यदासिश्चा ओषधीभिः पुनीतात्.. (५) हे अध्वर्युजनो! जिस प्रकार सुंदरी युवतियों से मिलकर पुरुष हर्षित और प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार जिन जलों से मिलकर सोम मुदित होते हैं, उन्हीं जलों को लाने के लिए जाओ. लाए हुए जलों से सोम को धोओ और सोम के साथ-साथ दशापवित्र को शुद्ध करो. (५) एवेद्शूने युवतयो नमन्त यदीमुशनूशतीरेत्यच्छ. सं जानते मनसा सं चिकित्रेऽध्वर्यवो धिषणापश्च देवीः.. (६) जिस प्रकार अभिलाषापूर्ण युवक, पुरुष की कामना करने वाली युवती को पाकर नम्र हो जाता है, उसी प्रकार जल सोम की ओर अनुकूल बनकर बहते हैं. अध्वर्युजनों एवं उनकी स्तुतियों से जलदेव का विशेष परिचय है. दोनों एक-दूसरे के उपकार को देखते हैं. (६) यो वो वृताभ्यो अकृणोदु लोकं यो वो मह्या अभिशस्तेरमुञ्चत्. तस्मा इन्द्राय मधुमन्तमूर्मिं देवमादनं प्र हिणोतनापः.. (७) हे जलो! जिस इंद्र ने तुम्हारे मेघ द्वारा घिरे होने पर निकलने के लिए मार्ग बनाया एवं जिसने तुम्हें मेघ की कठिन पकड़ से छुड़ाया, उसी इंद्र के लिए मधुरतापूर्ण तथा देवों को प्रमुदित करने वाली अपनी लहर भेजो. (७) प्रास्मै हिनोत मधुमन्तमूर्मिं गर्भो यो वः सिन्धवो मध्व उत्सः. घृतपृष्ठमीड्यमध्वरेष्वापो रेवतीः शृणुता हवं मे.. (८) हे बहने वाले जलो! तुम्हारे गर्भ के समान मधुर रस वाला जो झरना है, उसकी मधुर तरंग को इंद्र के लिए भेजो. हे धनयुक्त जलो! मेरी पुकार सुनो. तुम्हारी तरंग यज्ञों में घृतयुक्त एवं प्रशंसनीय है. (८) तं सिन्धवो मत्सरमिन्द्रपानमूर्मिं प्र हेत य उभे इयर्ति. मदच्युतमौशानं नभोजां परि त्रितन्तुं विचरन्तमूत्सम्.. (९) हे बहने वाले जलो! तुम्हारी जो तरंग इस लोक और परलोक—दोनों के लिए लाभ करती है, उसी मदकारिणी तरंग को इंद्र के पान के लिए भेजो. तुम्हारी तरंग नशा करने वाली, सोम के साथ मिलने की इच्छुक, अंतरिक्ष में उत्पन्न एवं तीनों लोकों में घूमने के लिए ऊपर जाती है. (९) आवर्वततीरध नु द्विधारा गोषुयुधो न नियवं चरन्तीः. ebook converter DEMO Watermarks*