भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1619, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1619

बनाओ. तुम हमारी अभिलाषापूर्ति के लिए हमें सुख दो तथा घृत द्वारा आहुति दी गई अग्नि को देवों के प्रति अभिमुख बनाओ. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (६) उप ह्वये सुहवं मारुतं गणं पावकम्ऋष्वं सख्याय शंभुवम्. रायस्पोषं सौश्रवसाय धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (७) मैं शोभन आह्वान वाले, शुद्धिकर्त्ता, दर्शनीय, सुखदाता व धन के पोषक मरुद्गण को मित्रता पाने के लिए बुलाता हूं तथा विशेषरूप से अन्न पाने के लिए मैं उनका ध्यान करता हूं. हम आज देवों से विशेष रक्षा की याचना करते हैं. (७) अपां पेरुं जीवधन्यं भरामहे देवाव्यं सुहवमध्वरश्रियम्. सुरश्मिं सोममिन्द्रियं यमीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (८) हम जल का पालन करने वाले, जीवों को धन्य करने वाले, देवों को तृप्ति देने वाले, शोभन स्तुति वाले, यज्ञ की शोभा व शोभन दीप्तियुक्त सोम को धारण करते हैं एवं उनसे शक्ति की याचना करते हैं. आज हम देवों से वही प्रसिद्ध रक्षा मांगते हैं. (८) सनेम तत्सुसनिता सनित्वभिर्वयं जीवा जीवपुत्रा अनागसः. ब्रह्मद्विषो विष्वगेनो भरेरत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (९) हम और हमारे पुत्र दीर्घजीवी तथा अपराधरहित बनकर एवं अपनी संतान के साथ बांटकर सोमरस का पान करें. हम ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले लोग सब प्रकार के पापों से पूर्ण हों. आज हम देवों से उसी रक्षा की याचना करते हैं. (९) ये स्था मनोर्यज्ञियास्ते शृणोतन यद्वो देवा ईमहे तद्ददातन. जैत्रं क्रतुं रयिमद्वीरवद्यशस्तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (१०) हे मनुष्यों का यज्ञ पाने के योग्य देवो! तुम हमारी स्तुति सुनो. हम तुमसे जो कुछ मांगते हैं, वह हमें दो. हमें जय प्रदान करने वाला ज्ञान व धन एवं संतान से युक्त यश दो. आज हम देवों से उसी प्रसिद्ध रक्षा की याचना करते हैं. (१०) महदद्य महतामा वृणीमहेऽवो देवानां बृहतामनर्वणाम्. यथा वसु वीरजातं नशामहै तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (११) हम आज श्रेष्ठ, महान् और अद्वितीय देवों से अधिक रक्षा की प्रार्थना करते हैं. आज हम देवों से उसी विशेष रक्षा की प्रार्थना करते हैं, जिससे हमें धन एवं संतान प्राप्त हो सके. (११) महो अग्नेः समिधानस्य शर्मण्यनागा मित्रे वरुणे स्वस्तये. ebook converter DEMO Watermarks*