ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1624, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंबनते हो. लोग तुम्हें अंधे और दुर्बलों का ही नहीं, यज्ञ का वैद्य भी कहते हैं. (३) युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुनर्युवानं चरथाय तक्षथुः. निष्टौग्र्यमूहथुरद्भ्यस्परि विश्वेत्ता वां सवनेषु प्रवाच्या.. (४) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार बढ़ई पुराने रथ को नया बनाकर चलने योग्य कर देता है, उसी प्रकार तुमने वृद्ध च्यवन ऋषि को जवान बनाकर चलने-फिरने लायक कर दिया था. तुमने तुग्र के पुत्र भुज्यु को जल के ऊपर तैराकर किनारे पर लगा दिया था. तुम्हारे वे कार्य यज्ञ के समय विशेषरूप से वर्णन करने योग्य हैं. (४) पुराणा वां वीर्या३ प्र ब्रवा जनेऽथो हासथुर्भिषजा मयोभुवा. ता वां नु नव्याववसे करामहेऽयं नासत्या श्रदरिर्यथा दधत्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! मैं लोगों के सामने तुम्हारे सभी पुराने वीर कर्मों का वर्णन करती हूं. तुम दोनों सुख देने वाले वैद्य हो. मैं तुमसे रक्षा पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करती हूं. मेरी स्तुति पर यजमान श्रद्धा करते हैं. (५) इयं वामह्वे शृणुतं मे अश्विना पुत्रायेव पितरा मह्यं शिक्षतम्. अनापिरज्ञा असजात्यामतिः पुरा तस्या अभिशस्तेरव स्पृतम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. जिस प्रकार पिता पुत्र को सीख देता है, उसी प्रकार तुम मुझे सिखाओ. मैं बंधुरहित, ज्ञानशून्य जातिरहित एवं बुद्धिहीन हूं. तुम दुर्गति से पहले ही मेरी रक्षा करो. (६) युवं रथेन विमदाय शुन्ध्युवं न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषणाम्. युवं हवं वध्रिमत्या अगच्छतं युवं सुषुतिं चक्रथुः पुरन्धये.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुम पुरुमित्र की कन्या शुंध्युव को विमद के साथ विवाह करने के लिए रथ द्वारा ले गए थे. तुम वध्रिमती द्वारा बुलाए जाने पर आए थे एवं तुमने उस बुद्धिमती के लिए शोभन ऐश्वर्य दिया था. (७) युवं विप्रस्य जरणामुपेयुषः पुनः कलेरकृणुतं युवद्वयः. युवं वन्दनमृश्यदादुदूपथुर्युवं सद्यो विश्पलामेतवे कृथः.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुमने बुढ़ापे को प्राप्त एवं मेधावी कलि ऋषि को दुबारा जवान बना दिया था. तुमने वंदन नामक ऋषि को कुएं से निकाला था एवं लंगड़ी विश्पला को लोहे का पैर लगाकर चलने योग्य बना दिया था. (८) युवं ह रेभं वृषणा गुहा हितमुदैरयतं ममृवांसमश्विना. युवमृबीसमुत तप्तमत्रय ओमन्वन्तं चक्रथुः सप्तवध्रये.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*