भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1625, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1625

हे अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! तुमने गुफा में पड़े हुए एवं मरणासन्न रेभ ऋषि को बाहर निकाला था. तुमने सात बंधनों से बंधे एवं जलते हुए अग्निकुंड में फेंके गए अत्रि ऋषि के लिए वर्षा करके अग्नि शांत कर दी थी. (९) युवं श्वेतं पेदवेऽश्विनाश्वं नवभिर्वाजैर्नवती च वाजिनम्. चर्कृत्यं ददथुर्द्र्रावयत्सखं भगं न नृभ्यो हव्यं मयोभुवम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! तुमने राजा पेदु के लिए निन्यानवे घोड़ों के साथ एक शक्तिशाली घोड़ा दिया था. वह घोड़ा शत्रुओं पर विजय पाने वाला व शत्रुओं के मित्रों को भगाने वाला था. वह मनुष्यों के लिए आह्वान करने योग्य, सुखदाता एवं धन के समान सेवनीय था. (१०) न तं राजानावदिते कुतश्चन नांहो अश्नोति दुरितं नकिर्भयम्. यमश्विना सुहवा रुद्रवर्तनी पुरोरथं कृणुथः पत्न्या सह.. (११) हे स्वामी! दीनतारहित, शोभन आह्वान वाले एवं प्रशंसनीय मार्ग वाले अश्विनीकुमारो! तुम जिस पतिपत्नी को अपने रथ के अगले भाग में बैठा लेते हो, उसे न पाप लगता है, न दुर्दशा उसके पास आती है और न उसे किसी से भय रहता है. (११) आ तेन यातं मनसो जवीयसा रथं यं वामृभवश्चक्रुरश्विना. यस्य योगे दुहिता जायते दिव उभे अहनी सुदिने विवस्वतः.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! मन के समान वेगशाली उसी रथ पर बैठकर आओ, जिसे तुम्हारे लिए ऋभु नामक देवों ने बनाया था एवं जिस रथ के संयोग से सूर्यपुत्री उषा जन्म लेती है व सूर्य से शोभन दिन-रात उत्पन्न होते हैं. (१२) ता वर्तिर्यातं जयुषा वि पर्वतमपिन्वतं शयवे धेनुमश्विना. वृकस्य चिद्वर्तिकामन्तरास्याद्युवं शचीभिर्ग्रसिताममुञ्चतम्.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! तुम उसी जयशील रथ के द्वारा पर्वत की ओर जाने वाले मार्ग पर जाओ एवं शंयु के लिए बूढ़ी गाय को पुनः दुधारू बना दो. तुमने भेड़िए के मुंह में फंसी हुई वर्तिका नामक चिड़िया को अपने कर्मों के प्रभाव से छुड़ाया था. (१३) एतं वां स्तोममश्विनावकर्मातक्षाम भृगवो न रथम्. न्यमृक्षाम योषणां न मर्ये नित्यं न सूनुं तनयं दधानाः.. (१४) हे अश्विनीकुमारो! भृगुवंशियों ने जिस प्रकार रथ बनाया, उसी प्रकार हमने तुम्हारे लिए यह स्तोत्र बनाया है. जिस प्रकार दामाद को देने के लिए कन्या का शृंगार किया जाता है, उसी प्रकार हमने यह रथ सजाया है. हम इस स्तोत्र को यज्ञकर्त्ता पुत्र के समान सदा धारण करते हैं. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*