ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1638, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंविभूवस के पुत्र त्रित ऋषि ने पाने की इच्छा करके इन महान् अग्नि को धरती के ऊपर प्राप्त किया था. सुख बढ़ाने वाले एवं युवा अग्नि यजमानों के घरों में सभी ओर से उत्पन्न होकर स्वर्ग की नाभि बनते हैं. (३) मन्द्रं होतारमुशिजो नमोभिः प्राञ्चं यज्ञं नेतारमध्वराणाम्. विशामकृण्वन्नरतिं पावकं हव्यवाहं दधतो मानुषेषु.. (४) मादक, होमनिष्पादक, गतिशील, यज्ञ के योग्य, यज्ञों के नेता, यज्ञशाला में वर्तमान, शोधक एवं हव्यवाहक अग्नि को मनुष्यों में धारण करने वाले तथा अग्नि की अभिलाषा करने वाले ऋत्विजों ने स्तुतियों द्वारा प्रसन्न किया. (४) प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरा अमूरं पुरां दर्माणम्. नयन्तो गर्भं वनां धियं धुर्हिरिश्मश्रुं नार्वाणं धनर्चम्.. (५) हे स्तोता! तुम जयशील, महान् एवं मेधावियों को धारण करने वाले अग्नि की स्तुति करने में समर्थ बनो. सभी लोग बुद्धिमान्, पुरियों को नष्ट करने वाले, अरणि के गर्भरूप, स्तुतियोग्य, हरे रंग के बालों के समान, ज्वालाओं से युक्त एवं प्रीतिकर स्तोत्रों वाले अग्नि को हव्य देकर अपने कर्मों को प्राप्त करते हैं. (५) नि पस्त्यासु त्रितः स्तभ्यन्परीवीतो योनौ सीददन्तः. अतः सङ्गृह्या विशां दमूना विधर्मणायन्नैरीयते नॄन्.. (६) अग्नि गार्हपत्य आदि तीन स्थानों में विस्तृत, यजमान के गृहों को स्थिर करने के इच्छुक व चारों ओर ज्वालाओं से घिरे हुए यज्ञशाला में स्थित वेदी पर बैठते हैं. अग्नि यहां से प्रजाओं के हव्य लेकर एवं पुरोडाश आदि स्वीकृत करके देवों को देने की इच्छा से यज्ञकर्मों के शत्रुओं का नियंत्रण करते हुए देवों के समीप जाते हैं. (६) अस्याजरासो दमामरित्रा अर्चद्धूमासो अग्नयः पावकाः. श्वितीचयः श्वात्रासो भुरण्यवो वनर्षदो वायवो न सोमाः.. (७) इस यजमान के पास जरारहित, शत्रुओं पर शासन करने वाली, पूजा के योग्य ज्वालाओं से युक्त, शुद्ध करने वाली श्वेतवर्ण, शीघ्रगति वाली, प्रजाओं का भरण करने वाली, वन में रहने वाली एवं सोम के समान गतिशील अग्नियां हैं. (७) प्र जिह्वया भरते वेपो अग्निः प्र वयुनानि चेतसा पृथिव्याः. तमायवः शुचयन्तं पावकं मन्द्रं होतारं दधिरे यजिष्ठम्.. (८) अग्नि अपनी ज्वाला के द्वारा यज्ञकर्म को धारण करते हैं एवं धरती की रक्षा के लिए अनुग्रहपूर्वक स्तुतियां स्वीकार करते हैं. गतिशील मनुष्य दीप्तिशाली, शुद्ध करने वाले, स्तुतियोग्य, होमनिष्पादक एवं अतिशय यज्ञपात्र अग्नि को धारण करते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*