भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1637, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1637

हे अग्नि! तुम शोभन हव्यों वाले यज्ञों के समय यजमान को मनचाहा फल दो एवं स्तोत्र के उच्चारण के समय भी उसकी अभिलाषा पूरी करो. वह यजमान सूर्य और अग्नि का प्रिय हो एवं उत्पन्न तथा भविष्य में जन्म लेने वाले पुत्रों की सहायता से शत्रु का नाश करे. (१०) त्वामग्ने यजमाना अनु द्यून्विश्वा वसु दधिरे वार्याणि. त्वया सह द्रविणमिच्छमाना व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः.. (११) हे अग्नि! यजमान तुम्हारे लिए प्रतिदिन सभी उत्तम धनों को धारण करते हैं. राक्षसों द्वारा चुराए गए गोधन की अभिलाषा करने वाले मेधावी देवों ने तुम्हारे साथ राक्षसों की पशुशाला का द्वार खोला. (११) अस्ताव्यग्निर्नरां सुशेवो वैश्वानर ऋषिभिः सोमगोपाः. अद्वेषे द्यावापृथिवी हुवेम देवा धत्त रयिमस्मे सुवीरम्.. (१२) हम ऋषियों ने मानवों को शोभन सुख देने वाले, सभी मानवों के हितैषी व सोम के द्वारा रक्षणीय अग्नि की स्तुति की. हम द्वेषरहित द्यावा-पृथिवी का आह्वान करते हैं. हे देवो! तुम हमें शोभन संतानयुक्त धन दो. (१२) सूक्त—४६ देवता—अग्नि प्र होता जातो महान्न्नभोविन्वृषद्वधा सीददपामुपस्थे. दधिर्यो धायि स ते वयांसि यन्ता वसूनि विधते तनूपाः.. (१) मानवों में रहने वाले, अंतरिक्ष की गोद में बिजली के रूप में बैठे हुए, गुणों के कारण पूज्य व अंतरिक्ष के ज्ञाता अग्नि उत्पन्न होते ही यजमानों के होता बने. यज्ञधारणकर्त्ता अग्नि वेदी पर स्थित किए गए हैं. हे वत्सप्रि! वे अग्नि तुझ परिचारक के लिए अन्न एवं धन देने वाले तथा शरीररक्षक बनें. (१) इमं विधन्तो अपां सधस्थे पशुं न नष्टं पदैरनु ग्मन्. गुहा चतन्तमुशिजो नमोभिरिच्छन्तो धीरा भृगवोऽविन्दन्.. (२) लोग जिस प्रकार पैरों के निशान देखकर चुराए हुए पशुओं का पीछा करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारी सेवा करने वाले ऋषियों ने जलों के बीच तुम्हें ढूंढ़ा. तुम्हारी कामना करने वाले एवं बुद्धिमान् भृगुवंशी ऋषियों ने एकांत में छिपे हुए अग्नि को स्तुतियों द्वारा प्राप्त किया. (२) इमं त्रितो भूर्यविन्ददिच्छन्व्वैभूवसो मूर्धन्यघ्न्यायाः. स शेवृधो जात आ हर्म्येषु नाभिर्युवा भवति रोचनस्य.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*