ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1645, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंमित्रता के कारण मनुष्यों के हितैषी, सबके ईश्वर, सबके द्वारा प्रशंसित इंद्र मुझ जैसे व्यक्ति द्वारा बार-बार सेवनीय हैं. हे सज्जनों के पालक एवं शूर इंद्र! सभी कठिन कार्यों एवं शक्ति द्वारा संपन्न होने वाले कर्मों में तथा जलप्राप्ति के लिए सब तुम्हारी पूजा करते हैं. (२) के ते नर इन्द्र ये त इषे ये ते सुम्नं सधन्य१मियक्षान्. के ते वाजायासुर्याय हिन्विरे के अप्सु स्वासूर्वरासु पौंस्ये.. (३) हे इंद्र! वे महान् लोग कौन हैं जो तुमसे अन्न, धनसहित सुख एवं कल्याण प्राप्त करते हैं? तुम्हें असुरविनाश योग्य शक्ति प्रदान करने वाला सोमरस देने वाले लोग कौन हैं? अपनी उपजाऊ भूमियों पर वर्षा का जल एवं बल पाने के लिए तुम्हें हवि देने वाले लोग कौन हैं? (३) भुवस्त्वमिन्द्र ब्रह्मणा महान्भुवो विश्वेषु सवनेषु यज्ञियः. भुवो नँश्च्यौत्नो विश्वस्मिन्भरे ज्येष्ठश्च मन्त्रो विश्वचर्षणे.. (४) हे इंद्र! तुम हमारी स्तुति से महान् बने हो. तुम सभी यज्ञों में यज्ञ का भाग पाने के योग्य हो. तुम सभी युद्धों में शत्रुओं को हराने वाले बने हो. हे सबके दर्शक इंद्र! तुम सर्वोत्तम मंत्र के समान हो. (४) अवा नु कं ज्यायान् यज्ञवनसो महीं त ओमात्रां कृष्टयो विदुः. असो नु कमजरो वर्धाश्च विश्वेदेता सवना तूतमा कृषे.. (५) हे सर्वोत्तम इंद्र! तुम स्तोताओं की शीघ्र रक्षा करो. मनुष्य तुम्हारी महती रक्षाशक्ति को जानते हैं. तुम जरारहित होकर हवि आदि से शीघ्र बढ़ो एवं इन सभी यज्ञों को शीघ्र पूर्ण करो. (५) एता विश्वा सवना तूतमा कृषे स्वयं सूनो सहसो यानि दधिषे. वराय ते पात्रं धर्मणे तना यज्ञो मन्त्रो ब्रह्मोद्यतं वचः.. (६) हे शक्ति के पुत्र इंद्र! तुम जिन यज्ञों को धारण करते हो, उन्हें शीघ्र ही पूर्ण करते हो. हे शत्रुनाशकर्त्ता इंद्र! तुम्हारा पात्र हमारी रक्षा करे, तुम्हारा धन हमको धारण करे एवं यज्ञ, मंत्र और ब्रह्मवाक्य तुम्हारे समीप उपस्थित हों. (६) ये ते विप्र ब्रह्मकृतः सुते सचा वसूनां च वसुनश्च दावने. प्र ते सुम्नस्य मनसा पथा भुवन्मदे सुतस्य सोम्यस्यान्धसः.. (७) हे मेधावी इंद्र! जो स्तोता विविध धन एवं निवासस्थान पाने की इच्छा से सोमरस निचोड़ जाने पर तुम्हारी सेवा करते हैं, वे उस समय मनोमार्ग से सुख पाने के अधिकारी बनते हैं. निचोड़े हुए सोमरस का नशा उन्हें चढ़ जाता है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*