ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1646, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—५१ देवता—अग्नि आदि महत्तदुल्बं स्थविरं तदासीद्येनाविष्टितः प्रविवेशिथापः. विश्वा अपश्यद्बहुधा ते अग्ने जातवेदस्तन्वो देव एकः.. (१) देवों ने अग्नि से कहा—"हे अग्नि! वह आवरण विशाल एवं स्थूल था, जिससे लिपटे हुए तुम जलों में प्रविष्ट हुए थे. हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे विविध प्रकार के शरीरों को एक देव ने देखा." (१) को मा ददर्श कतमः स देवो यो मे तन्वो बहुधा पर्यपश्यत्. क्वाह मित्रावरुणा क्षियन्त्यग्नेर्विश्वा समिधो देवयानीः.. (२) अग्नि ने उत्तर दिया—"मुझे किसने देखा था? वह कौन सा देव है, जिसने मेरे विविध शरीरों को देखा था? हे मित्र और वरुण! मुझ अग्नि की दीप्त एवं देवयज्ञ साधन देह कहां है? यह बताओ." (२) ऐच्छाम त्वा बहुधा जातवेदः प्रविष्टमग्ने अप्स्वोषधीषु. तं त्वा यमो अचिकेच्चित्रभानो दशान्तरुष्यादतिरोचमानम्.. (३) देव कहने लगे—"हे जातवेद अग्नि! जलों और ओषधियों में अनेक प्रकार से घुसे हुए तुम्हें हम कहां खोजें? हे विचित्र किरणों वाले अग्नि! दस आवासस्थानों में अत्यंत प्रकाशमान तुम्हें यम ने पहचान लिया था." (३) होत्रादहं वरुण बिभ्यदायं नेदेव मा युनजन्नत्र देवाः. तस्य मे तन्वो बहुधा निविष्टा एतमर्थं न चिकेताहमग्निः.. (४) अग्नि बोले—"हे वरुण! मैं हव्य-वहन के कार्य से डरकर यहां आ गया हूं. मैं चाहता हूं कि देवगण मुझे पहले के समान हव्य वहन के कार्य में न लगावें. इसी भय के कारण मेरा शरीर अनेक प्रकार से जल में छिपा है. मैं अब यह हव्यवहन का काम स्वीकार नहीं करूंगा." (४) एहि मनुर्देवयुर्यज्ञकामोऽरङ्कृत्या तमसि क्षेष्यग्ने. सुगान्पथः कृणुहि देवयानान्वह हव्यानि सुमनस्यमानः.. (५) देवों ने कहा—"हे अग्नि! आओ, यजमान देवों का अभिलाषी एवं यज्ञ करने का इच्छुक है. तुम तेजपुंज को धारण करते हुए भी अंधकार में हो. देवों के प्रति आने वाले लोगों का मार्ग सरल बनाओ एवं प्रसन्नचित्त होकर हव्य-वहन करो. (५) अग्नेः पूर्वे भ्रातरो अर्थमेतं रथीवाध्वानमन्वावरीवुः. ebook converter DEMO Watermarks*