भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1663, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1663

उत त्या मे रौद्रावर्चिमन्ता नासत्याविन्द्र गूर्तये यजध्यै. मनुष्वद्वृक्तबर्हिषे रराणा मन्दू हितप्रयसा विक्षु यज्यू.. (१५) हे इंद्र! वे प्रसिद्ध रुद्रपुत्र एवं दीप्तिशाली अश्विनीकुमार मेरी स्तुति एवं यज्ञ को स्वीकार करें. वे मनु के यज्ञ के समान मेरे यज्ञ में भी प्रसन्न हों. वे प्रजाओं को धन दें तथा यज्ञ के योग्य बनें. (१५) अयं स्तुतो राजा वन्दि वेधा अपश्च विप्रस्तरति स्वसेतुः. स कक्षीवन्तं रेजयत्सो अग्निं नेमिं न चक्रमर्वतो रघुद्रु.. (१६) ये सबके विधाता सोम राजा सबके द्वारा प्रशंसित हैं. हमने भी उनकी प्रशंसा की है. जिस सोम की किरणें जगद्बंधक हैं, वे प्रतिदिन अंतरिक्ष को लांघते हैं. घोड़े जिस प्रकार रथ के पहिए की नेमि को कंपित करते हैं, उसी प्रकार सोम कक्षीवान् ऋषि और अग्नि को कंपाते हैं. (१६) स द्विबन्धुर्वेतरणो यष्टा सबर्धूँ धेनुमस्वं दुहध्यै. सं यन्मित्रावरुणा वृञ्ज उक्थैर्यैँष्ठेभिरर्यमणं वरूथैः.. (१७) वे अग्नि दोनों लोकों का कल्याण करने वाले हैं. वे विशेषरूप से तारक एवं यज्ञकर्त्ता हैं. अग्नि ने दुधारू गाय को उस समय दुहने योग्य बनाया, जब वह ब्याने योग्य नहीं थी. शंयु ऋषि ने महान् एवं प्रशंसनीय मंत्रों द्वारा मित्र, वरुण और अर्यमा की स्तुति की. (१७) तद्बन्धुः सूरिर्दिवि ते धियंधा नाभानेदिष्ठो रपति प्र वेनन्. सा नो नाभिः परमास्य वा घाहं तत्पश्चा कतिथश्चिदास.. (१८) हे स्वर्ग में स्थित सूर्य! तुम्हारा बंधु मैं नाभानेदिष्ट तुम्हारा कर्मधारण करता हूं एवं गायों की अभिलाषा करता हुआ तुम्हारी स्तुति करता हूं. स्वर्ग हमारा एवं सूर्य का उत्पत्तिस्थान है. मैं सूर्य से कुछ ही पीढ़ी पीछे हूं. (१८) इयं मे नाभिरिह मे सधस्थमिमे मे देवा अयमस्मि सर्वः. द्विजा अह प्रथमजा ऋतस्येदं धेनुरदुहज्जायमाना.. (१९) यह स्वर्ग ही मेरा उत्पत्तिस्थान है. यही मेरा निवासस्थान है. सभी देव मेरे हैं एवं मैं उनका हूं. द्विजगण सत्यरूप ब्रह्मा से पहले उत्पन्न हुए. यज्ञरूपिणी गाय ने स्वयं उत्पन्न होकर यह सब उत्पन्न किया. (१९) अधासु मन्द्रो अरतिर्विभावाव स्यति द्विवर्तनिर्वनेषाट्. ऊर्ध्वा यच्छ्रेणिर्न शिशुर्दन्मक्षू स्थिरं शेवृधं सूत माता.. (२०) वे अग्नि प्रसन्न, गतिशील, दोनों लोकों में जाने वाले एवं काष्ठों को पराजित करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*