ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1667, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसावर्णेर्देवाः प्र तिरन्त्वायुर्यस्मिञ्श्रान्ता असनाम वाजम्.. (११) हजारों गौएं देने वाले एवं मनुष्यों के नेता मनु को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता. मनु की दक्षिणा सूर्य के साथ तीन लोकों में प्रसिद्ध हो. देवगण सावर्णि मनु की आयु बढ़ावें. यज्ञकर्मों में आलस्य न करने वाले हम मनु से अन्न प्राप्त करें. (११) सूक्त—६३ देवता—पथ्या और स्वस्ति परावतो ये दिधिषन्त आप्यं मनुप्रीतासो जनिमा विवस्वतः. ययातेर्ये नहुष्यस्य बर्हिषि देवा आसते ते अधि ब्रुवन्तु नः.. (१) जो देवगण दूर देश से आकर मनुष्यों के साथ मित्रता स्थापित करते हैं, मानवों द्वारा प्रसन्न होकर जो देव वैवस्वत मनु से उत्पन्न मनुष्यों को धारण करते हैं एवं जो देव नहुषपुत्र ययाति राजर्षि के यज्ञ में बैठते हैं, वे धन आदि देकर हमें पूजित करें. (१) विश्वा हि वो नमस्यानि वन्द्या नामानि देवा उत यज्ञियानि वः. ये स्थ जाता अदितेरद्भ्यस्परि ये पृथिव्यास्ते म इह श्रुता हवम्.. (२) हे देवो! तुम्हारे सभी नाम नमस्कार के योग्य, वंदनीय एवं यज्ञ के योग्य हैं. जो देव अदिति, जल एवं पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं, वे यहां हमारी पुकार को सुनें. (२) येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः. उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्रसस्ताँ आदित्याँ अनु मदा स्वस्तये.. (३) पृथ्वी माता जिन देवों के लिए मधुर दूध बहाती है और अदीन तथा बादलों से घिरा हुआ आकाश जिनके लिए अमृत धारण करता है, उन प्रशंसनीय शक्ति वाले, वर्षा करने वाले, शोभन कर्म वाले एवं अदितिपुत्र देवों के लिए स्तुति करो. (३) नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः. ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्म्माणं वसते स्वस्तये.. (४) बिना पलक गिराए यज्ञकर्म के नेताओं को देखने वाले देवों ने लोक की रक्षा के लिए विस्तृत अमृत प्राप्त किया था. तेजस्वी रथ वाले, विघ्नरहित यज्ञकर्मों वाले व पापरहित देवगण लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ग के उन्नत प्रदेश में रहते हैं. (४) सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिह्वृता दधिरे दिवि क्षयम्. ताँ आ विवास नमसा सुवृत्तिभिर्महो आदित्याँ अदितिं स्वस्तये.. (५) अपने तेज से भली-भांति सुशोभित एवं भली प्रकार उन्नत जो देव यज्ञ में आते हैं एवं किसी के द्वारा भी अहिंसित होकर स्वर्ग में रहते हैं, उन महान् देवों और अदिति की सेवा ebook converter DEMO Watermarks*