भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1668, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1668

कल्याण के निमित्त नमस्कार एवं शोभन स्तुतियों द्वारा करो. (५) को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यति ष्ठन. को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये.. (६) हे देवो! मेरे अतिरिक्त कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है, जिसकी तुम सेवा करो? हे ज्ञाता देवो! तुम संतान वाले बनो. मेरे अतिरिक्त कौन यजमान स्तुतियों द्वारा तुम्हारा यज्ञ अलंकृत करता है. यज्ञ हमें पाप से बचाकर हमारा कल्याण करता है. (६) येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः. त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये.. (७) सबसे पहले मनु श्रद्धायुक्त मन से सात होताओं के साथ अग्नि प्रज्वलित करके स्तुतियों द्वारा जिन देवों का यजन करते हैं, वे देव हमें निर्भय करें, कल्याण दें एवं हमारी भलाई के लिए सभी मार्गों को सुगम बनावें. (७) य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः. ते नः कृतादकृतादेनसस्पर्रद्यद्या देवासः पिपृता स्वस्तये.. (८) उत्तम ज्ञान वाले एवं सर्वज्ञ देव समस्त जंगम लोक के स्वामी हैं. हे देवो! तुम हमें कृत अथवा अकृत पाप से बचाकर आज हमारे कल्याण को बढ़ाओ. (८) भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेंऽहोमुचं सुकृतं दैव्यं जनम्. अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं द्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये.. (९) हम पाप से छुड़ाने वाले, शोभन-आह्वान वाले एवं शोभन कर्म वाले देवों के संबंधी इंद्र को सब यज्ञों में बुलाते हैं. हम अन्नलाभ और अविनाशी बनने के लिए अग्नि, मित्र, वरुण, भग, द्यावा-पृथिवी और मरुतों को बुलाते हैं. (९) सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्. दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. (१०) हम भली प्रकार रक्षा करने वाली, विस्तृत, पापरहित, शोभन, सुखयुक्त, क्षयरहित, सुदृढ़ गठन वाली, शोभन आचरण युक्त, निष्पाप एवं विनाशरहित द्युलोकरूपी नाव पर कल्याण के लिए चढ़ें. (१०) विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिद्रुतः. सत्यया वो देवहूत्या हुवेम शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये.. (११) हे यज्ञ के पात्र देवो! तुम रक्षा के निमित्त हमसे कहो एवं विनाश करने वाली दुर्गति से ebook converter DEMO Watermarks*