भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1743, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1743

जो उर्वशी आकाश से गिरने वाली बिजली के समान शुभ्र बनी तथा मेरी विस्तृत अभिलाषाओं को पूर्ण किया, उसके गर्भ से मानवहितकारी पुत्र उत्पन्न हुआ. उस समय उर्वशी ने मुझे दीर्घ आयु प्रदान की. (१०) जज्ञिष इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत्पुरूरवो म ओजः. अशासं त्वा विदुषी सस्मिन्नहन्न म आशृणोः किमभुग्वदासि.. (११) उर्वशी ने कहा—“हे पुरूरवा! धरती की रक्षा के लिए तुम पुत्ररूप में उत्पन्न हुए थे. इसी हेतु तुमने मेरे उदर में अपना तेज गर्भरूप में धारण किया था. उस समय मैंने तुम्हें बता दिया था कि किसी परिस्थिति में तुम्हारे पास नहीं रहूंगी. उस समय तुमने मेरी बात नहीं सुनी. इस समय व्यर्थ बातें क्यों कर रहे हो?” (११) कदा सूनुः पितरं जात इच्छाच्चक्रन्नाश्रु वर्तयद्विजानन्. को दम्पती समनसा वि यूयोधद यदग्निः श्वशुरेषु दीदयत्.. (१२) पुरूरवा ने कहा—“तुम्हारे उदर से उत्पन्न पुत्र मुझे कब चाहेगा? मुझे पितारूप में जानकर क्या वह आंसू नहीं बहाएगा? एक-दूसरे को चाहने वाले पति-पत्नी को कौन अलग करना चाहेगा? इस समय तुम्हारे उदर से उत्पन्न पुत्ररूपी अग्नि तुम्हारे ससुर के घर में प्रज्वलित हो.” (१२) प्रति ब्रवाणि वर्तयते अश्रु चक्रन्न क्रन्ददाध्ये शिवायै. प्र तत्ते हिनवा यत्ते अस्मे परेह्यस्तं नहि मूर मापः.. (१३) उर्वशी ने कहा—“मैं तुम्हारी बात का उत्तर दे रही हूं. मेरा पुत्र तुम्हारे पास जाकर कभी आंसू नहीं बहाएगा. मैं सदा उसके कल्याण का ध्यान रखूंगी. मैं तुम्हारे पुत्र को तुम्हारे पास पहुंचा दूंगी. हे ज्ञानरहित पुरूरवा! अब अपने घर लौट जाओ. तुम मुझे नहीं पा सकोगे.” (१३) सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत्परावतं परमां गन्तवा उ. अधा शयीत निर्ऋतेरुपस्थेऽधैनं वृका रभसासो अद्युः.. (१४) पुरूरवा ने कहा—“तुम्हारे साथ क्रीड़ा करने वाला तुम्हारा प्रेमी मैं आज ही गिर पडूंगा. फिर कभी नहीं उठूंगा. मैं बहुत दूर चला जाऊंगा. मैं उस दुर्दशा में ही मर जाऊंगा एवं वेगशील भेड़िए मुझे खा जाएंगे.” (१४) पुरूरवो मा मृथा मा प्र पप्तो मा त्वा वृकासो अशिवास उ क्षन्. न वै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता.. (१५) उर्वशी ने कहा—“हे पुरूरवा! तुम मत मरो. तुम धरती पर मत गिरो. अशुभ भेड़िए तुम्हें न खाएं. स्त्रियों की मैत्री वास्तविक नहीं होती. स्त्रियों का हृदय भेड़ियों के हृदय के ebook converter DEMO Watermarks*

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