ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1744, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमान होता है।” (१५) यद्विरूपाचरं मर्त्येष्ववसं रात्रीः शरदश्चतस्रः. घृतस्य स्तोकं सकृदह्न आश्रां तादेवेदं तात्पाणा चरामि.. (१६) “मैंने अनेक रूप धारण करके मानवों में भ्रमण किया है. मैं चार वर्ष तक रात के समय मानवों के बीच रही हूं. मैं दिन में एक बार घी पीकर तृप्त हो गई हूं और विचरण करती रही हूं.” (१६) अन्तरिक्षप्रां रजसो विमानीमुप शिक्षाम्युर्वशीं वसिष्ठः. उप त्वा रातिः सुकृतस्य तिष्ठान्नि वर्तस्व हृदयं तप्यते मे.. (१७) पुरूरवा ने कहा—“अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाली एवं जल का निर्माण करने वाली उर्वशी को अतिशय वासदाता पुरूरवा (मैं) वश में करता हूं. शोभन कर्म वाला पुरूरवा तुम्हारे पास रहे. मेरा हृदय तप्त हो रहा है. तुम लौट आओ. (१७) इति त्वा देवा इम आहुरैळ यथेमेतद्भवसि मृत्युबन्धुः. प्रजा ते देवान्हविषा यजाति स्वर्ग उ त्वमपि मादयासे.. (१८) उर्वशी ने कहा—“हे इड़ा के पुत्र पुरूरवा! ये सारे देव कह रहे हैं कि तुम मृत्यु को वश में करने वाले बनोगे. तुम हव्य द्वारा देवों का उत्तम यज्ञ करोगे एवं स्वर्ग में आनंद पाओगे.” (१८) सूक्त—९६ देवता—इंद्र के घोड़े प्र ते महे विदथे शंसिषं हरी प्र ते वन्वे वनुषो हर्यतं मदम्. घृतं न यो हरिभिश्चारु सेचत आ त्वा विशन्तु हरिवर्पसं गिरः.. (१) हे शत्रुहिंसक इंद्र! मैं यज्ञ में तुम्हारे घोड़ों की विशेष प्रशंसा करता हूं एवं तुमसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करता हूं. तुम अपने हरि नामक घोड़ों द्वारा आकर हमें घी से सींचो. हे शुभ्रवर्ण इंद्र! मेरी स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. (१) हरिं हि योनिमभि ये समस्वरन्हिन्वन्तो हरी दिव्यं यथा सदः. आ यं पृणन्ति हरिभिर्न धेनव इन्द्राय शूंषं हरिवन्तमर्चत.. (२) हे स्तोताओ! पुराने स्तोताओं ने इंद्र को यज्ञगृह की ओर प्रेरित किया तथा इंद्र के घोड़ों को यज्ञ में बुलाया. गाएं जिस प्रकार दूध से भिगोती हैं, उसी प्रकार उन्होंने इंद्र को सोमरस से तृप्त किया. तुम भी इंद्र एवं उनके घोड़ों की शक्ति की प्रशंसा करो. (२) सो अस्य वज्रो हरितो य आयसो हरिनिकामो हरिborder/रा गभस्त्योः. ebook converter DEMO Watermarks*