भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1752, कुल 1855 में से

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तुम देवों के गमन के सभी मार्ग जानते हो. तुम समयानुसार कौरववंशी शांतनु को स्वर्ग में स्थित करो. (११) अग्ने बाधस्व वि मृधो वि दुर्गाहापामीवामप रक्षांसि सेध. अस्मात्समुद्राद् बृहतो दिवो नोऽपां भूमानमुप नः सृजेह.. (१२) हे अग्नि! तुम शत्रुओं की दुर्गम नगरियों को बाधा पहुंचाओ तथा रोगों व राक्षसों को दूर करो. तुम इस द्युलोकरूपी विशाल सागर से हमारे लिए अधिक जल बरसाओ. (१२) सूक्त—९९ देवता—अग्नि कं नश्चित्रमिषण्यसि चिकित्वाम्पृथुग्मानं वाश्रं वावृधध्यै. कत्तस्य दातु शवसो व्युष्टौ तक्षद्वज्रं वृत्रतुरमपिन्वत्.. (१) हे इंद्र! तुम ठीक से जानबूझकर हमें विचित्र धन देते हो. तुम हमारी वृद्धि के लिए वृद्धिशील एवं प्रशंसनीय संपत्ति देते हो. इंद्र के बल की वृद्धि के लिए हमें क्या देना पड़ेगा? त्वष्टा ने इंद्र के लिए वृत्रनाशक वज्र बनाया और उन्होंने वर्षा की है. (१) स हि द्युता विद्युता वेति साम पृथुं योनिमसुरत्वा ससाद. स सनीळेभिः प्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्य मायाः.. (२) इंद्र दीप्तिशाली आयुध से युक्त होकर यज्ञ में गाए जाते सामगीत सुनने जाते हैं एवं बलपूर्वक अनेक स्थानों पर बैठते हैं. आदित्यों के सातवें भाई एवं सदा साथ रहने वाले मरुतों के सहयोग से शत्रु को हराने वाले इंद्र को छोड़कर कोई कार्य होना संभव नहीं है. (२) स वाजं यातापदुष्पदा यन्त्स्वर्षता परि षदत्सनिष्यन्. अनर्वा यच्छतदुरस्य वेदी घञ्जिञ्छ्रदेवाँ अभि वर्पसा भूत्.. (३) संग्राम में जाने वाले के लिए इंद्र स्खलनरहित गति से जाते हैं एवं शत्रुओं का धन अपने भक्तों में बांटने की इच्छा से संग्राम में स्थित होते हैं. युद्ध में स्थिर इंद्र शत्रु की सौ द्वारों वाली नगरी में स्थित धन को जानकर अपने बल से लाते हैं एवं इंद्रियपरायण दुरात्माओं को हराते हैं. (३) स यह्व्योऽवनीर्गोष्वर्वा जुहोति प्रधन्यासु ससिः. अपादो यत्र युज्यासोऽरथा द्रोण्यश्वास ईरते घृतं वाः.. (४) मेघों में गतिशील एवं चलने में कुशल इंद्र उत्तम धन वाली धरती में महान् जलों को बिखेरते हैं. वहां चरणरहित एवं रथविहीन अर्थात् छोटी-छोटी नदियां एकत्र होकर बिना नावों के घृत के समान जल बहाती हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*