ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1787, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते. यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः.. (९) हमारे समान रूप वाले दोनों हाथों की धारण शक्ति समान नहीं है. एक ही माता से उत्पन्न गाएं बराबर दूध नहीं देतीं. जुड़वां भाइयों का पराक्रम एक जैसा नहीं होता. एक परिवार में जन्म लेने वाले दो व्यक्ति बराबर दान नहीं करते. (९) सूक्त—११८ देवता—राक्षस नाशक अग्नि अग्ने हंसि न्य१त्रिणं दीद्यन्मर्त्येष्वा. स्वे क्षये शुचिव्रत.. (१) हे पवित्र व्रत वाले अग्नि! तुम मनुष्यों के मध्य अपने स्थान पर प्रज्वलित होकर शत्रुओं का नाश करो. (१) उत्तिष्ठसि स्वाहुतो घृतानि प्रति मोदसे. यत्त्वा सुचः समस्थिरन्.. (२) हे शोभन आहुति वाले अग्नि! तुम उठते हो और घी पाकर प्रसन्न होते हो. तुम्हारे लिए सुच उठाए जाते हैं. (२) स आहुतो वि रोचतेऽग्निरीळेन्यो गिरा. सुचा प्रतीकमज्यते.. (३) बुलाए गए एवं स्तुतियों द्वारा प्रशंसा योग्य अग्नि प्रज्वलित होते हो. एवं सभी देवों से पहले घी के द्वारा सींचे जाते हैं. (३) घृतेनाग्निः समज्यते मधुप्रतीक आहुतः. रोचमानो विभावसुः.. (४) घृतयुक्त अवयव वाले अग्नि घृतरूपी हव्य से सिंचते हैं. वे स्तुतियों द्वारा रोचमान एवं दीप्ति वाले हैं. (४) जरमाणः समिध्यसे देवेभ्यो हव्यवाहन. तं त्वा हवन्त मर्त्याः.. (५) हे देवों का हव्य वहन करने वाले अग्नि! तुम स्तोताओं द्वारा प्रशंसित होकर प्रज्वलित होते हो, मनुष्य तुम्हें बुलाते हैं. (५) तं मर्ता अमर्त्यं घृतेनाग्निं सपर्यत. अदाभ्यं गृहपतिम्.. (६) हे मनुष्यो! घृत द्वारा मरणरहित, अपराजेय एवं गृहपति अग्नि की सेवा करो. (६) अदाभ्येन शोचिषाग्ने रक्षस्त्वं दह. गोपा ऋतस्य दीदिहि.. (७) हे अग्नि! अपने अपराजेय तेज के द्वारा तुम राक्षसों को जलाओ एवं धन के रक्षक ebook converter DEMO Watermarks*