भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1826, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1826

आदित्यै रुद्रैर्वसुभिर्न आ गहि मृळीकाय न आ गहि.. (१) हे देवों के लिए हव्य वहन करने वाले तथा प्रज्वलित अग्नि! तुम्हें दीप्त किया गया है. तुम आदित्यों, वसुओं और रुद्रों के साथ सुख देने के लिए इस यज्ञ में पधारो. (१) इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि. मर्तासस्त्वा समिधान हवामहे मृळीकाय हवामहे.. (२) हे अग्नि! यह यज्ञ एवं ये स्तुतियां तुम्हारी हैं. तुम सेवित होते हुए पास आओ. हे अग्नि! हम मनुष्य तुम्हें सुख के लिए बुलाते हैं. (२) त्वामु जातवेदसं विश्ववारं गृणे धिया. अग्ने देवाँ आ वह नः प्रियव्रतान्मृळीकाय प्रियव्रतान्.. (३) हे जातवेद एवं सबके द्वारा वरण करने योग्य अग्नि! मैं स्तुतियों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करता हूं. हे अग्नि! प्रियव्रत वाले अग्नि को हमारे सुख के लिए लेकर यहां आओ. (३) अग्निर्देवो देवानाम्भवत्पुरोहितोऽग्निं मनुष्या३ऋषयः समीधिरे. अग्निं महो धनसातावहं हुवे मृळीकं धनसातये.. (४) अग्नि देव देवों के पुरोहित बने. मनुष्यों और ऋषियों ने अग्नि को प्रज्वलित किया था. मैं धन पाने के लिए महान् अग्नि को बुलाता हूं. वे मुझे सुखी करें. (४) अग्निरत्रिं भरद्वाजं गविष्ठिरं प्रावन्नः कण्वं त्रसदस्युमाहवे. अग्निं वसिष्ठो हवते पुरोहितो मृळीकाय पुरोहितः.. (५) अग्नि ने युद्ध में अत्रि, भरद्वाज, गविष्ठिर, कण्व और त्रसदस्यु की रक्षा की है. पुरोहित वसिष्ठ अग्नि को सुख के लिए बुलाते हैं. (५) सूक्त—१५१ देवता—श्रद्धा श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः. श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि.. (१) श्रद्धा के द्वारा अग्नि प्रज्वलित होते हैं एवं हवि अग्नि में डाला जाता है. श्रद्धा धन के शीश पर स्थित है, यह बात मैं स्तोत्र द्वारा जानता हूं. (१) प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः. प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि.. (२)