ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1828, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंवि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः. यो अस्माँ अभिदासत्यधरं गमया तमः.. (४) हे इंद्र! हमारे शत्रुओं को मारो तथा हमसे लड़ने के इच्छुक लोगों को बलहीन बनाओ. जो हमें चारों ओर से हानि पहुंचाता है, उसे निकृष्ट अंधकार में डाल दो. (४) अपेन्द्र द्विषतो मनोऽप जिज्यासतो वधम्. वि मन्योः शर्म यच्छ वरीयो यवया वधम्.. (५) हे इंद्र! शत्रु का मनोबल तोड़ दो. जो हमें जर्जर करना चाहता है, उस पर आयुध चलाओ. हमें शत्रु के क्रोध से बचाकर सुख दो एवं शत्रु के आयुध को हमसे अलग करो. (५) सूक्त—१५३ देवता—इंद्र ईङ्खयन्तीरपस्युव इन्द्रं जातमुपासते. भेजानासः सुवीर्यम्.. (१) अपना कर्म करने की इच्छुक एवं स्तुति के साथ इंद्र के पास पहुंचने वाली इंद्र की माताएं उत्पन्न हुए इंद्र की सेवा करती हैं एवं इंद्र से शोभन धन प्राप्त करती हैं. (१) त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः. त्वं वृषन्वृषेदास.. (२) हे इंद्र! तुम बल, वीर्य और ओज के साथ उत्पन्न हुए हो. हे वर्षा करने वाले इंद्र! तुम हमारी अभिलाषा पूर्ण करो. (२) त्वमिन्द्रासि वृत्रहा व्य१न्तरिक्षमतिरः. उद् द्यामस्तभ्ना ओजसा.. (३) हे इंद्र! तुम वृत्रनाशक हो एवं तुमने आकाश को विस्तृत किया है. तुमने अपनी शक्ति से स्वर्ग को ऊपर टिकाया है. (३) त्वमिन्द्र सजोषसमर्कं बिभर्षि बाह्वोः. वज्रं शिशान ओजसा.. (४) हे इंद्र! तुम अपने साथी सूर्य को दोनों हाथों से धारण करते हो एवं बलपूर्वक वज्र की धार तेज करते हो. (४) त्वमिन्द्राभिभूरसि विश्वा जातान्योजसा. स विश्वा भुव आभवः.. (५) हे इंद्र! तुम सभी प्राणियों को अपने तेज से हराते हो एवं सभी स्थानों पर तुम्हारा अधिकार है. (५) सूक्त—१५४ देवता—मृत व्यक्ति ebook converter DEMO Watermarks*