भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1829, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1829

सोम एकेभ्यः पवते घृतमेक उपासते. येभ्यो मधु प्रधावति ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (१) कुछ पितरों के लिए सोमरस निचोड़ा जाता है और कुछ घी का सेवन करते हैं. हे प्रेत! तुम उन पितरों के पास जाओ, जिनके लिए मधु बहता है. (१) तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः. तपो ये चक्रिरे महस्ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (२) हे प्रेत! तुम उन पितरों के समीप जाओ, जो तपस्या करके अपराजेय बने, जो तपस्या से स्वर्ग गए एवं जिन्होंने महान् तप किया. (२) ये युध्यन्ते प्रधनेषु शूरासो ये तनूत्यजः. ये वा सहस्रदक्षिणास्ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (३) हे प्रेत! तुम उन पितरों के समीप जाओ जो युद्धक्षेत्र में युद्ध करते हैं, जिन शूरों ने शरीर का मोह छोड़ दिया था अथवा जिन्होंने हजारों मुद्राएं दक्षिणा में दीं. (३) ये चित्पूर्व ऋतसाप ऋतावान ऋतावृधः. पितॄन्तपस्वतो यम ताँश्चिद्देवापि गच्छतात्.. (४) हे यम! यह प्रेत उन्हीं पितरों के पास जाए जो उत्तम कर्म करके पुण्य वाले बने, जिन्होंने यज्ञ को बढ़ाया एवं जिन्होंने तपस्या की. (४) सहस्रणीथाः कवयो ये गोपायन्ति सूर्यम्. ऋषीन् तपस्वतो यम तपोजाँ अपि गच्छतात्.. (५) हे यम! यह प्रेत उन्हीं तपस्या करने वाले एवं देवों से उत्पन्न ऋषियों के समीप जावे जो हजारों प्रकार के उत्तम कर्म कर चुके हैं, बुद्धिमान् बने हैं एवं जो सूर्य की रक्षा करते हैं. (५) सूक्त—१५५ देवता—दरिद्रतानाश अरायि काणे विकटे गिरिं गच्छ सदान्वे. शिरिम्बिठस्य सत्वभिस्तेभिष्ट्वा चातयामसि.. (१) हे दानविरोधिनी, बुरा शब्द करने वाली, विकृत गमन वाली व सदा क्रोध करने वाली दरिद्रता! तुम पर्वत पर जाओ. मैं शिरिंबिष्ठ अपने उपायों से तुम्हें दूर भेजता हूं. (१) चत्तो इतश्चत्तामुतः सर्वा भ्रूणान्यारुषी. अराय्यं ब्रह्मणस्पते तीक्ष्णशृङ्गोदृषन्निहि.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

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