भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1833, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1833

असपत्ना सपत्नघ्नी जयन्त्यभिभूवरी. आवृक्षमन्‍यासां वर्चो राधो अस्‍थेयसामिव.. (५) मैं शत्रुरहित एवं शत्रुओं का हनन करने वाली हूं. मैं शत्रुओं पर विजय पाती एवं उन्हें पराजित करती हूं. जिस प्रकार अस्थिर चित्त वालों का धन दूसरे ले जाते हैं, उसी प्रकार मैं दूसरी नारियों का तेज समाप्त कर देती हूं. (५) समजैषमिमा अहं सपत्नीरभिभूवरी. यथाहमस्य वीरस्य विराजानि जनस्य च.. (६) मैं अपनी सब सौतों को जीतती हूं. मैं उन्हें पराजित करने वाली हूं, इसी कारण मैं इन वीर इंद्र एवं परिवार के अन्य लोगों पर अधिकार करती हूं. (६) सूक्त—१६० देवता—इंद्र तीव्रस्याभिवयसो अस्य पाहि सर्वरथा वि हरी इह मुञ्च. इन्द्र मा त्वा यजमानासो अन्य नि रीरमन्तुभ्यमिमे सुतास:.. (१) हे इंद्र! तुम शीघ्र नशा करने वाला व चरु पुरोडाश युक्त सोमरस पिओ. तुम अपने गतिशील घोड़ों को इधर आने के लिए छोड़ो. अन्य यजमान तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पाए. हमने तुम्हारे लिए यह सोमरस निचोड़ा है. (१) तुभ्यं सुतास्तुभ्यमु सोत्वासस्त्वां गिर: श्वात्र्या आ ह्वयन्ति. इन्द्रेदमद्य सवनं जुषाणो विश्वस्य विद्वाँ इह पाहि सोमम्.. (२) हे इंद्र! जो सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है, वह तुम्हारे लिए ही रहेगा. उच्चारण की जाती हुई स्तुतियां तुम्हें बुलाती हैं. तुम हमारा यह यज्ञ स्वीकार करके सोमपान करो. तुम सब जानते हो. (२) य उशता मनसा सोममस्मै सर्वहृदा देवकाम: सुनोति. न गा इन्द्रस्तस्य परा ददाति प्रशस्तमिच्चारुमस्मै कृणोति.. (३) जो व्यक्ति अभिलाषापूर्ण मन से, संपूर्ण हृदय से एवं देवाभिलाषी बनकर इस इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ता है, इंद्र उसकी गाएं नष्ट नहीं करते. वे उसके लिए प्रशंसनीय एवं सुंदर धन देते हैं. (३) अनुस्पष्टो भवत्येषो अस्य यो अस्मै रेवान् सुनोति सोमम्. निररत्नौ मघवा तं दधाति ब्रह्मद्विषो हन्त्यनानुदिष्ट:.. (४) जो धनवान् यजमान इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ता है, इंद्र उसके सामने प्रत्यक्ष होते हैं. धनी इंद्र उसका हाथ पकड़ लेते हैं एवं यज्ञविरोधियों को बिना किसी के कहे हुए नष्ट कर देते