ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1834, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं. (४) अश्वायन्तो गव्यन्तो वाज॒यन्तो हवामहे त्वोपगन्तवा उ. आभूषन्तस्ते सुमतौ नवायां वयमिन्द्र त्वा शुनं हुवेम.. (५) हे इंद्र! हम घोड़े, गायों एवं अन्न की अभिलाषा से तुम्हारे आगमन की प्रार्थना करते हैं. हम तुम्हें सुखदाता जानते हैं, इसलिए यह नवीन स्तोत्र बनाकर तुम्हें बुलाते हैं. (५) सूक्त— १६१ देवता— इंद्र मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्. ग्राहिर्जग्राह यदि वैतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्.. (१) हे रोगी! यज्ञसामग्री द्वारा मैं तुम्हें यक्ष्मा एवं राजयक्ष्मा रोग से छुड़ाता हूं. मैं तुम्हारे जीवन के लिए ऐसा करता हूं. इस रोगी को यदि किसी दुष्ट ग्रह ने पकड़ा हो तो इंद्र एवं अग्नि इसे उससे छुड़ावें. (१) यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव. तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्षमेनं शतशारदाय.. (२) यदि इस रोगी की आयु समाप्त हो चुकी है, यह इस लोक से गया हुआ सा है अथवा यह मृत्यु के समीप पहुंच चुका है, तब भी मैं मृत्यु की देवता निर्ऋति के पास से इसे लौटा सकता हूं. मैंने सौ वर्ष जीने के लिए इसको छुआ है. (२) सहस्राक्षेण शतशारदेन शतायुषा हविषाहार्षमेनम्. शतं यथेमं शरदो नयातीन्द्रो विश्वस्य दुरितस्य पारम्.. (३) मैंने हजार आंखों वाले, सौ वर्ष वाले एवं सौ वर्ष की आयु वाले यज्ञ से इसका रोग नष्ट किया है. इंद्र इस रोगी को सौ वर्ष तक सभी पापों के पार ले जावें. (३) शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्. शतमिन्द्राग्नी सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषेमं पुनर्दुः... (४) हे रोगविमुक्त व्यक्ति! तुम सुखपूर्वक सौ शरद, सौ वसंत एवं सौ हेमंत ऋतुओं तक वृद्धि पाकर जीवित रहो. इंद्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति यज्ञ से प्रसन्न होकर इसके लिए सौ वर्ष की आयु दें. (४) आहार्षं त्वाविदं त्वा पुनरागाः पुनर्नव. सर्वाङ्ग सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च तेऽविदम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*