भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1839, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1839

मैं शत्रुओं को नष्ट करने वाला हूं एवं इंद्र के समान अपराजित तथा अहिंसित हूं. ये सभी शत्रु मेरे चरणों में पड़े हुए हैं. (२) अत्रैव वोऽपि नह्याम्युभे आर्त्नी इव ज्यया. वाचस्पते नि षेधेमान्यथा मदधरं वदान्.. (३) हे शत्रुओ! जिस प्रकार धनुष के दोनों सिरे डोरी से बांधे जाते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हें पाशों से बांधता हूं. हे वाचस्पति! इन्हें मना कर दो कि मेरी बात के बीच में न बोलें. (३) अभिभूरहमागमं विश्वकर्मेण धाम्ना. आ वश्चित्तमा वो व्रतमा वोऽहं समितिं ददे.. (४) मैं इस समस्त कार्य करने वाले अपने तेज से शत्रुओं को पराजित करने आया हूं. हे शत्रुओ! मैं तुम्हारे मन, कार्य एवं संगठन को छीनता हूं. (४) योगक्षेमं व आदायाहं भूयासमुत्तम आ वो मूर्धानमक्रमीम्. अधस्पदान्म उद्गदत मण्डूका इवोदकान्मण्डूका उदकादिव.. (५) हे शत्रुओ! मैं तुम्हारा योगक्षेम छीनकर तुम्हारी अपेक्षा उत्तम हुआ हूं. मैं तुम्हारे सिर पर चढ़ गया हूं. जिस प्रकार मेंढक पानी में बोलते हैं, उसी प्रकार तुम मेरे पैरों के नीचे चीत्कार करो. (५) सूक्त—१६७ देवता—इंद्र तुभ्येदमिन्द्र परि षिच्यते मधु त्वं सुतस्य कलशस्य राजसि. त्वं रयिं पुरुवीरामु नस्कृधि त्वं तपः परितप्याजयः स्वः.. (१) हे इंद्र! यह मधुर सोमरस तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. इस सोमरस भरे कलश के स्वामी तुम ही हो. तुम हमें अधिक संतान वाला धन दो. तुमने तपस्या करके स्वर्ग को जीता है. (१) स्वर्जितं महि मन्दानमन्धसो हवामहे परि शक्रं सुताँ उप. इमं नो यज्ञमिह बोध्या गहि स्पृधो जयन्तं मघवानमीमहे.. (२) हम स्वर्ग को जीतने वाले व सोमपान से प्रसन्न इंद्र को निचोड़े हुए सोमरस के समीप बुलाते हैं. हे इंद्र! हमारे इस यज्ञ को जानो तथा यहां आओ. हम शत्रुविजयी इंद्र की शरण में आए हैं. (२) सोमस्य राज्ञो वरुणस्य धर्मणि बृहस्पतेरनुमत्या उ शर्मणि. तवाहमद्य मघवन्नुपस्तुतौ धातर्विधातः कलशाँ अभक्षयम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित) · पृष्ठ 1839, कुल 1855 में से · BharatKosha